
नई दिल्ली । मोटापा (Obesity) को लंबे समय तक केवल बढ़ते वजन और शारीरिक बनावट से जुड़ी समस्या माना जाता रहा है, लेकिन अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे कई गंभीर बीमारियों की मूल वजह के रूप में चिन्हित किया है। नई स्वास्थ्य गाइडलाइन (Health Guidelines) में स्पष्ट किया गया है that मोटापा (Obesity) केवल एक जोखिम कारक नहीं, बल्कि हृदय रोग (Heart Disease), किडनी संबंधी बीमारियों (Kidney Diseases) और मेटाबॉलिक विकारों (Metabolic Disorders) की जड़ बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता वजन शरीर के विभिन्न अंगों पर एक साथ असर डालता है और समय के साथ कई जटिल स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देता है।
नई गाइडलाइन के अनुसार शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी, विशेष रूप से पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी, सामान्य वजन बढ़ने की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक होती है। यह चर्बी शरीर के भीतर लगातार सूजन की स्थिति पैदा कर सकती है और कई महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित करती है। इसके कारण इंसुलिन का प्रभाव कम होने लगता है, रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचता है और शरीर की प्राकृतिक संतुलन प्रणाली पर नकारात्मक असर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पेट के अंदर अंगों के आसपास जमा होने वाली चर्बी, जिसे विसरल फैट कहा जाता है, स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। यह चर्बी ऐसे रसायनों का उत्सर्जन करती है जो शरीर में लगातार सूजन को बढ़ावा देते हैं। यही स्थिति धीरे-धीरे इंसुलिन रेजिस्टेंस का कारण बनती है, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही हृदय पर दबाव बढ़ता है और किडनी की कार्यक्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मोटापे के प्रभाव को केवल वजन मशीन के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। कई बार समान वजन वाले दो व्यक्तियों की स्वास्थ्य स्थिति पूरी तरह अलग हो सकती है। इसका कारण शरीर में चर्बी के वितरण का अंतर होता है। यदि चर्बी मुख्य रूप से पेट और आंतरिक अंगों के आसपास जमा हो रही है तो बीमारी का जोखिम काफी बढ़ जाता है, भले ही व्यक्ति सामान्य रूप से स्वस्थ दिखाई देता हो।
भारत के संदर्भ में यह चेतावनी और भी अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देश में मोटापा, डायबिटीज और उच्च रक्तचाप के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी, अनियमित खानपान और बढ़ते तनाव ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते मोटापे को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में हृदय और किडनी रोगों का बोझ और बढ़ सकता है।
गाइडलाइन में कार्डियोवैस्कुलर-किडनी-मेटाबॉलिक सिंड्रोम की अवधारणा पर भी विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत हृदय, किडनी और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ माना गया है। विशेषज्ञों के अनुसार मोटापा अक्सर इसी चक्र की शुरुआत करता है, जिसके बाद एक बीमारी दूसरी बीमारी को जन्म देती चली जाती है। इसलिए केवल किसी एक रोग का इलाज पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र को ध्यान में रखते हुए रोकथाम और उपचार की रणनीति अपनानी होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर मोटापे के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना और पेट के बढ़ते घेराव पर ध्यान देना भी आवश्यक है। नई गाइडलाइन का मुख्य संदेश यही है कि मोटापे को हल्के में लेने की बजाय एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देखा जाए, क्योंकि यही समस्या आगे चलकर कई जानलेवा बीमारियों की वजह बन सकती है।
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