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ओजोन परत की रिकवरी की रफ्तार पड़ सकती है धीमी, फीडस्टॉक रसायनों का रिसाव बनेगा बाधा

May 01, 2026

नई दिल्ली। ओजोन परत (Ozone Layer) के सुधार को लेकर अब तक मिल रहे सकारात्मक संकेतों के बीच एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन (International Studies) ने चिंता बढ़ा दी है। शोध के अनुसार, औद्योगिक फीडस्टॉक रसायनों का छिपा हुआ रिसाव ओजोन परत की रिकवरी की रफ्तार को धीमा कर सकता है। नेचर कम्युनिकेशन्स (Nature Communications) में प्रकाशित इस अध्ययन में बताया गया है कि यह रिसाव पहले के अनुमान से कहीं ज्यादा है, जिससे ओजोन परत के 1980 के स्तर तक लौटने में अतिरिक्त समय लग सकता है।

ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल की अहम सुरक्षा परत है, जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती है। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया था कि यह परत तेजी से क्षतिग्रस्त हो रही है, खासकर अंटार्कटिका के ऊपर बने ओजोन छिद्र के कारण। इसका प्रमुख कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) जैसे रसायन थे, जिनका उपयोग रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर और एयरोसोल उत्पादों में किया जाता था।

वैश्विक प्रयासों से सुधार, लेकिन चुनौती बरकरार
इस समस्या से निपटने के लिए 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल लागू किया गया, जिसके तहत 197 देशों ने ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने पर सहमति जताई। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन प्रयासों के कारण ओजोन परत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है और यह 2040 से 2060 के बीच 1980 के स्तर के करीब पहुंच सकती है। इससे त्वचा कैंसर सहित कई स्वास्थ्य जोखिमों में कमी आने की उम्मीद है।


  • नए शोध में बड़ा खुलासा
    हालिया अध्ययन में पाया गया है कि फीडस्टॉक रसायन जिनका उपयोग प्लास्टिक, नॉन-स्टिक कोटिंग और अन्य औद्योगिक उत्पादों में होता है, वास्तव में अनुमान से कहीं अधिक मात्रा में वातावरण में लीक हो रहे हैं। पहले जहां इनसे लगभग 0.5% उत्सर्जन माना जाता था, वहीं नए आंकड़ों के अनुसार यह 3 से 4% तक हो सकता है। यह अतिरिक्त रिसाव ओजोन परत की रिकवरी को प्रभावित कर रहा है।

    विशेषज्ञों की चेतावनी
    वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि इस रिसाव को नियंत्रित नहीं किया गया, तो ओजोन परत के पूरी तरह ठीक होने में करीब 7 साल तक की अतिरिक्त देरी हो सकती है। हालांकि, यदि समय रहते इस पर नियंत्रण पा लिया जाए, तो सुधार की गति को फिर से तेज किया जा सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अब औद्योगिक रसायनों के उपयोग और उनके उत्सर्जन पर कड़ी निगरानी की जरूरत है। साथ ही, कम हानिकारक विकल्प मौजूद होने के बावजूद पुराने और अधिक नुकसानदेह तरीकों पर निर्भरता कम करना जरूरी हो गया है।

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