
नई दिल्ली। करीब 11 साल पहले जब सऊदी अरब ने यमन (Yemen) में हूतियों (Houthis) के खिलाफ सैन्य अभियान (Military Operation) में पाकिस्तान (Pakistan) से लड़ाकू विमान, युद्धपोत और सैनिक भेजने को कहा था, तब इस्लामाबाद ने जंग में सीधे उतरने से इनकार कर दिया था। 10 अप्रैल 2015 को पाकिस्तान की संसद ने पांच दिन की बहस के बाद यमन संघर्ष में तटस्थ रहने का फैसला किया था। हालांकि, साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता या मक्का-मदीना जैसे पवित्र स्थलों को खतरा होने पर पाकिस्तान उसके साथ खड़ा रहेगा।
अब 2026 में परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। अगस्त में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट किया था। समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा। 5 अक्टूबर को रियाद में हुई आपात बैठक के बाद इस समझौते को लागू करने की दिशा में कदम उठाए गए और पाकिस्तान-तुर्किये से सऊदी अरब को सैन्य बल और क्षमताएं उपलब्ध कराने की बात कही गई। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या इस बार पाकिस्तान और तुर्किये की मदद से सऊदी अरब हूतियों को निर्णायक रूप से हरा पाएगा?
कागज पर तीनों की सैन्य ताकत भारी
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये की संयुक्त सैन्य क्षमता हूतियों से कहीं बड़ी है। सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम हैं। पाकिस्तान के पास बड़ी थल और वायुसेना के साथ विभिन्न सैन्य अभियानों का अनुभव है। वहीं तुर्किये ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता के साथ नाटो का लंबा सैन्य अनुभव रखता है।
लेकिन यमन की लड़ाई सिर्फ सैन्य ताकत का मुकाबला नहीं है। पहाड़ी इलाकों, गुफाओं और सुरंगों वाला उत्तरी यमन हूतियों को गुरिल्ला युद्ध के लिए अनुकूल परिस्थितियां देता है। मोबाइल मिसाइल लॉन्चर और विकेंद्रित कमांड संरचना की वजह से उनके ठिकानों को पूरी तरह खत्म करना किसी भी बड़ी सेना के लिए मुश्किल साबित हो सकता है।
सऊदी अरब पहले भी लंबे युद्ध में उलझ चुका है
सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने 2015 से यमन में हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया। इसके बावजूद हूती संगठन की सैन्य और मिसाइल क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी। बाद के वर्षों में अमेरिका और ब्रिटेन ने भी हूती ठिकानों पर हमले किए, लेकिन संगठन की क्षमता बनी रही।
हालिया घटनाक्रम में सऊदी समर्थित यमनी सरकारी बलों ने बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य और उसके आसपास के इलाकों में हूतियों के खिलाफ बढ़त बनाने का दावा किया है। 5 अक्टूबर को यमनी रक्षा मंत्रालय ने मोखा पर कब्जे की जानकारी दी थी। दूसरी ओर, हूतियों की ओर से सऊदी अरब में हमले किए जाने के दावे भी सामने आए हैं।
पाकिस्तान और तुर्किये की भूमिका कितनी होगी?
मक्का डिफेंस पैक्ट के सक्रिय होने के बाद पाकिस्तान और तुर्किये की सैन्य मौजूदगी सऊदी अरब की सुरक्षा क्षमता बढ़ा सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसमें एयर डिफेंस, निगरानी, खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक्स और प्रशिक्षण जैसी भूमिकाएं अहम हो सकती हैं।
हालांकि, समझौते के लागू होने का अर्थ यह जरूरी नहीं है कि दोनों देश सीधे यमन के अंदर बड़े पैमाने पर जमीनी युद्ध में उतरेंगे। पाकिस्तान की ओर से भी अभी अपनी सैन्य भूमिका के सभी ऑपरेशनल विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देश सऊदी अरब की रक्षा को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे सकते हैं, जबकि सीधे युद्ध में उतरने का फैसला अलग राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
हूतियों को पूरी तरह खत्म करना अब भी मुश्किल
सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्किये का सहयोग मिलने से उसकी रक्षा और सैन्य क्षमता निश्चित रूप से मजबूत हो सकती है। एयर डिफेंस, निगरानी और मिसाइल हमलों से निपटने की क्षमता बढ़ने के साथ यमनी सरकारी बलों को भी मदद मिल सकती है।
लेकिन हूतियों को पूरी तरह खत्म करने की चुनौती अलग है। पहाड़ी इलाकों में उनकी मौजूदगी, स्थानीय नेटवर्क, सुरंगों और गुरिल्ला रणनीति के कारण किसी सैन्य गठबंधन के लिए पूरे उत्तरी यमन पर नियंत्रण कायम करना आसान नहीं होगा।
इसलिए मौजूदा हालात में ज्यादा वास्तविक संभावना यह है कि पाकिस्तान और तुर्किये की मदद से सऊदी अरब हूतियों पर सैन्य दबाव बढ़ा सकता है और उनकी हमले की क्षमता को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है। लेकिन उन्हें पूरी तरह समाप्त करना या यमन में स्थायी सैन्य समाधान हासिल करना अब भी बेहद कठिन लक्ष्य बना हुआ है।
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