
नई दिल्ली। दुनिया (World) लंबे समय तक बढ़ती आबादी (Population) और घटते संसाधनों (Resources) की चिंता करती रही है। लेकिन अब जनसंख्या की तस्वीर दूसरी दिशा में बदल रही है। दुनिया के 64 देश और क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आबादी अपने उच्चतम स्तर यानी ‘पीक पॉपुलेशन’ को पार कर चुकी है। इन जगहों पर जनसंख्या अब बढ़ने के बजाय लगातार कम होने की राह पर है।
इस बदलाव की खास बात यह है कि इसमें केवल छोटे या संकटग्रस्त देश ही नहीं हैं। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, इटली, जर्मनी, स्पेन और रूस जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी इस स्थिति में पहुंच चुकी हैं। इसका असर स्कूलों, रोजगार, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और भविष्य की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है।
चीन से जापान तक घटती आबादी का असर
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश चीन अपना जनसंख्या शिखर पार कर चुका है। वहां आबादी में अब हर साल कमी दर्ज हो रही है। दक्षिण कोरिया में स्थिति और गंभीर है। यहां फर्टिलिटी रेट करीब 0.72 रह गई है। मौजूदा रुझान जारी रहने पर इस सदी के अंत तक दक्षिण कोरिया की आबादी आधे से भी कम रह जाने का अनुमान है।
जापान और थाईलैंड भी इसी दौर से गुजर रहे हैं। जापान में बुजुर्ग आबादी बढ़ने का असर इतना गहरा है कि कई इलाकों में बच्चों की संख्या घटने के कारण स्कूल बंद हो चुके हैं। वहां आबादी का बूढ़ा होना अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी चुनौती बन चुका है।
यूरोप में इटली, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रिया जैसे देश जनसंख्या के शिखर को पार कर चुके हैं। पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे पूर्वी यूरोपीय देशों में कम जन्मदर के साथ युवाओं का दूसरे देशों में जाना भी आबादी घटने की बड़ी वजह बना है।
64 देशों की सूची में एशिया, यूरोप और कैरिबियन के इलाके
पूर्वी और पूर्वी-दक्षिण एशिया में चीन, हांगकांग, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड इस स्थिति में पहुंच चुके हैं। यूरोप में इटली, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रिया शामिल हैं।
कैरिबियन और लैटिन अमेरिका के कई इलाके भी आबादी के शिखर को पार कर चुके हैं। इनमें क्यूबा, प्यूर्टो रिको, जमैका, उरुग्वे, डोमिनिका, मार्टिनिक, गुआदेलूप, कुराकाओ, मोंटसेराट, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट मार्टिन, सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनेडींस, यूएस वर्जिन आइलैंड्स और फॉकलैंड आइलैंड्स शामिल हैं।
जन्मदर में गिरावट के पीछे क्या है?
यह बदलाव किसी एक युद्ध, महामारी या प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं है। इसके पीछे समाज और जीवनशैली में आए लंबे समय के बदलाव हैं।
किसी देश की आबादी को मौजूदा स्तर पर बनाए रखने के लिए प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों की जरूरत मानी जाती है। इसे रिप्लेसमेंट रेट कहा जाता है। दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी अब ऐसे देशों में रहती है, जहां फर्टिलिटी रेट इस स्तर से काफी नीचे जा चुकी है।
शहरी जीवन की बढ़ती लागत भी इसका एक कारण है। बड़े शहरों में घर, बच्चों की परवरिश और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ा है। दूसरी ओर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में भागीदारी बढ़ने से शादी और मातृत्व का फैसला पहले की तुलना में देर से लिया जा रहा है। कई महिलाएं करियर को प्राथमिकता दे रही हैं, जबकि कुछ लोग बच्चे न पैदा करने का फैसला भी कर रहे हैं। इन सामाजिक और आर्थिक बदलावों का सीधा असर अब जनसंख्या के आंकड़ों में नजर आ रहा है।
अब भारत की बारी कब?
जनसंख्या में गिरावट का यह दौर उन देशों के लिए भी संकेत है जहां अभी आबादी बढ़ रही है। UN के प्रोजेक्शंस के मुताबिक ब्राजील, मैक्सिको और अर्जेंटीना 2050 के दशक में अपने जनसंख्या शिखर तक पहुंच सकते हैं।
भारत के लिए यह बदलाव 2060 के दशक में आने का अनुमान है। दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत उस समय करीब 170 करोड़ की आबादी के स्तर पर अपना पीक हासिल कर सकता है। इसके बाद यहां भी आबादी घटने का दौर शुरू होने का अनुमान है।
पूरी दुनिया की बात करें तो वैश्विक आबादी का शिखर करीब 2084 में आने का अनुमान है। उस समय दुनिया की कुल आबादी लगभग 10.3 अरब होगी। इसके बाद वैश्विक जनसंख्या के भी पहली बार लगातार घटने की दिशा में जाने की संभावना है।
अमेरिका की आबादी क्यों नहीं घट रही?
कम जन्मदर के बावजूद अमेरिका अभी इस स्थिति में नहीं पहुंचा है। UN के मुताबिक अमेरिका की आबादी का पीक इस सदी के अंत तक भी आने की संभावना नहीं है।
इसकी बड़ी वजह इमिग्रेशन है। विदेशों से बड़ी संख्या में युवा अमेरिका पहुंचते हैं और वहां बसते हैं। इससे कम जन्मदर के कारण पैदा होने वाली जनसंख्या कमी की काफी हद तक भरपाई हो जाती है।
यानी भविष्य में केवल जन्मदर ही किसी देश की आबादी तय नहीं करेगी। प्रवासन भी जनसंख्या और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाला बड़ा कारक होगा।
बूढ़ी होती दुनिया के सामने चार बड़ी चुनौतियां
वर्कफोर्स की कमी: युवा आबादी घटने पर कंपनियों को काम करने वाले लोगों की कमी का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और AI पर निर्भरता बढ़ेगी।
पेंशन और हेल्थकेयर का दबाव: टैक्स देने वाली कामकाजी आबादी घटेगी, जबकि पेंशन और इलाज पर निर्भर बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी। इससे सरकारों के राजस्व और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
इमिग्रेशन की अहमियत: जिन देशों में जन्मदर कम है, उनके लिए विदेशी युवाओं और कुशल कामगारों का आना आर्थिक जरूरत बन सकता है। दूसरी ओर, सीमित इमिग्रेशन वाले देशों के सामने वर्कफोर्स की समस्या ज्यादा गंभीर हो सकती है।
भारत के लिए समय सीमित: भारत और अफ्रीका जैसे युवा आबादी वाले देशों के पास डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने का समय सीमित है। अगले 20-30 साल में युवाओं को बेहतर शिक्षा, स्किल और रोजगार उपलब्ध कराना अहम होगा। अगर युवा आबादी को उत्पादक संसाधन में नहीं बदला गया तो जनसंख्या घटने से पहले अपेक्षित आर्थिक समृद्धि हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
दुनिया की नई चुनौती: ज्यादा लोग नहीं, सही उम्र के लोग
दशकों तक दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बढ़ती आबादी रही। अब तस्वीर धीरे-धीरे पलट रही है। कई देशों में समस्या यह नहीं रह गई कि लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है, बल्कि यह है कि काम करने वाले युवाओं की संख्या घट रही है और बुजुर्गों का अनुपात बढ़ रहा है।
64 देशों में आबादी के सिकुड़ते ग्राफ से बाकी दुनिया के लिए यही संदेश निकलता है कि आने वाले दशकों की नीतियां केवल जनसंख्या नियंत्रण पर केंद्रित नहीं रह सकतीं। देशों को ऐसी अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था, रोजगार नीति और सामाजिक सुरक्षा तैयार करनी होगी जो कम और बूढ़ी होती आबादी के दौर में भी टिक सके।
भारत जैसे देशों के लिए इसका दूसरा संदेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है—युवा आबादी को अवसर देने का समय अभी है; यही आबादी भविष्य की ताकत बनेगी या बोझ, यह अगले कुछ दशकों में तय होगा।
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