
नई दिल्ली। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र (Bankipur Assembly Constituency) को लंबे समय तक भाजपा (BJP) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन उपचुनाव में प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की जीत के बाद सियासी समीकरण बदल गए हैं। विधायक बनने के बाद किशोर ने अब एक से दो साल में 10 हजार परिवारों के बच्चों को रोजगार दिलाने का ऐलान कर भाजपा के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि, भाजपा और राज्य सरकार की ओर से इस पर कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर प्रशांत किशोर के रोजगार अभियान का राजनीतिक असर बढ़ता है तो भाजपा इसका जवाब किस तरह देगी।
भाजपा के गढ़ में PK का रोजगार वाला दांव
प्रशांत किशोर ने मंगलवार को बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के यारपुर राजपूताना में एक कार्यक्रम के दौरान बेरोजगार युवाओं से अपना बायोडाटा और सीवी उनके कार्यालय में जमा कराने को कहा। उन्होंने दावा किया कि इन युवाओं को अगले एक से दो साल में रोजगार दिलाने की व्यवस्था की जाएगी।
किशोर ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले भी रोजगार और नौकरी के लिए बिहार से होने वाले पलायन को बड़ा मुद्दा बनाया था। हालांकि उनकी जन सुराज पार्टी के ज्यादातर उम्मीदवार चुनाव हार गए थे। बाद में भाजपा के तत्कालीन विधायक नितिन नवीन के इस्तीफे से बांकीपुर सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज की।
भाजपा को तुरंत जवाब देने की जरूरत क्यों नहीं लगी?
प्रशांत किशोर के रोजगार वाले ऐलान के बावजूद भाजपा की ओर से अभी तक कोई बड़ा काउंटर कैंपेन सामने नहीं आया है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि उसके पास ऐसे कई नेता और उनसे जुड़े कारोबारी समूह हैं, जो लंबे समय से बिहार में रोजगार और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध करा रहे हैं।
पार्टी जरूरत पड़ने पर इन्हीं उदाहरणों को सामने रखकर यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि भाजपा से जुड़े लोग भी राज्य में रोजगार सृजन कर रहे हैं।
आरके सिन्हा परिवार का उदाहरण
भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे पूर्व राज्यसभा सांसद रवींद्र किशोर सिन्हा (आरके सिन्हा) और उनके बेटे ऋतुराज सिन्हा का कारोबारी नेटवर्क इसका प्रमुख उदाहरण बताया जा रहा है। परिवार से जुड़ी कंपनियां निजी सुरक्षा, हाउसकीपिंग और अन्य सेवाओं के क्षेत्र में काम करती हैं।
दावे के मुताबिक, इन कंपनियों में बड़ी संख्या में बिहार के लोग काम करते हैं। PF रिकॉर्ड के हवाले से करीब 40 हजार कर्मचारियों के बिहार से जुड़े होने की बात कही गई है, जिनमें करीब 8 हजार कर्मचारी पटना के बताए जाते हैं। इसके अलावा आदि चित्रगुप्त माइक्रो फाइनेंस के जरिए करीब दो लाख महिला उद्यमियों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने का भी दावा किया गया है।
कई भाजपाई नेताओं के कारोबार में भी रोजगार
भाजपा के भीतर ऐसे कई नेताओं के नाम चर्चा में हैं, जिनके दवा कारोबार, औद्योगिक इकाइयों, शैक्षणिक संस्थानों, पेट्रोल पंप, वेयरहाउस, मखाना फैक्ट्री और वाहन एजेंसी जैसे कारोबार से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने की बात कही जाती है।
एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के औद्योगिक क्षेत्र में कई इकाइयां संचालित होने और स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने का दावा है। वहीं, एक मंत्री और दो पूर्व प्रदेश अध्यक्षों के शैक्षणिक संस्थानों में भी बड़ी संख्या में लोगों के काम करने की बात सामने आती है। इसके अलावा भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं के दवा कारोबार, प्रिंटिंग-विज्ञापन कारोबार और अन्य स्थानीय व्यवसायों में भी रोजगार के अवसर होने का दावा किया जा रहा है।
जरूरत पड़ी तो भाजपा चला सकती है ‘प्लान बी’
बिहार की राजनीति में रोजगार का मुद्दा नया नहीं है। 2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा प्रमुख मुद्दा बनाया था। 2025 के चुनाव में प्रशांत किशोर ने भी रोजगार और पलायन को जोर-शोर से उठाया, हालांकि चुनावी नतीजों पर इसका अपेक्षित असर नहीं दिखा।
ऐसे में भाजपा फिलहाल प्रशांत किशोर के दावे पर सीधे टकराव से बचती दिख रही है। लेकिन अगर बांकीपुर में रोजगार अभियान को व्यापक समर्थन मिलता है तो पार्टी अपने नेताओं और उनसे जुड़े कारोबारी उपक्रमों के जरिए अब तक पैदा किए गए रोजगार के आंकड़े सामने रख सकती है।
यानी प्रशांत किशोर ने नौकरी के मुद्दे पर सियासी दांव चला है, लेकिन भाजपा के पास जवाब देने के लिए अपने नेताओं के कारोबारी और रोजगार सृजन के उदाहरणों का ‘प्लान बी’ तैयार है।
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