
नई दिल्ली। जनगणना (Census) का अगला चरण (Second-phase) जाति आधारित गिनती (Caste Census) के लिहाज से खासा चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है। जाति जनगणना के लिए ऐसी प्रश्नावली (Questionnaire) तैयार की जा रही है ताकि नतीजे ज्यादा सटीक और तार्किक आ सकें। जनगणनाकर्मियों के सामने जाति संबंधी सूचना की प्रामाणिकता को सत्यापित करने का साधन भी तलाशा जा रहा है।
लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के हिमाच्छादित क्षेत्रों में जातिगत जनगणना इसी साल सितंबर में होनी है, ऐसे में जनगणना के दूसरे चरण से जुड़े सवाल अगस्त महीने में जारी कर दिए जाएंगे। जनगणना का पहला चरण अब पूरा होने को है। अगले चरण के लिए एक मार्च, 2027 के दिन को मानक मानकर लोगों की गिनती व उनकी जाति की गणना के लिए प्रश्नावली का फ्रेमवर्क बन रहा है। इसमें हर नागरिक से जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक, शिक्षा, प्रवास, प्रजनन आदि से संबंधित जानकारी मांगी जाएगी।
दूसरे चरण का काम शुरू करने से भारत के महारजिस्ट्रार और जनगणना आयुक्त कार्यालय की ओर से पहले जनगणना प्रगणकों का एक पूर्वाभ्यास कराया जा रहा है। इसमें जाति पता करने में कई तरह की भ्रामक या आधी अधूरी सूचनाएं मिल रही हैं। अब समस्या है कि जातियों व उपजातियों का वर्गीकरण कैसे किया जाए। अगर किसी से केवल उसकी जाति पूछी जाए, तो एक जाति वर्ग में आने वाले लोग अलग-अलग जगह पर अलग-अलग नाम ले रहे हैं। इसीलिए जातिगत आंकड़ों की सटीकता व शुद्धता पर ज्यादा जोर है।
अंग्रेजों के वक्त 4,147 जातियां थी, जबकि 2011 में 46 लाख जातियां
जब 1931 में आखिरी जातिगत जनगणना हुई, तो 4,147 जातियों के नाम सामने आए। जब 2011 की जनगणना के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना हुई, तो 46 लाख जातियां निकल आईं। जातियों की संख्या इसलिए बढ़ गई क्योंकि प्रश्नावली में सीधा सवाल पूछा गया कि आपकी जाति क्या है। जवाब में जातियों, उप-जातियों, गोत्र व कुल के नाम भी लोगों ने दर्ज कराए। इसीलिए केंद्र सरकार ने 2021 में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि 2011 में जाति गणना त्रुटियों से भरी हुई है।
शायद इसी वजह से इस कवायद का निर्रथक माना गया और इसके नतीजे सार्वजनिक नहीं हुए। अब उन्हीं व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने का काम किया जा रहा है। मसलन अनाथ और बेसहारा बच्चों की सही जाति जानने का काम खासा मुश्किल होगा, वे संभवत इसे बताने की स्थिति में न हों। अब जनगणना अधिकारियों को बताया गया है कि वे जाति की वर्तनी सही तरीके से दर्ज करें। एक जैसी ध्वनि वाली जातियों को अलग-अलग जातियों में दर्ज करने से पहले उसमें अंतर की पुष्टि होनी भी जरूरी है।
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