
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तराखंड बार काउंसिल के 10 निर्वाचित सदस्यों की याचिका पर केंद्र और बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जवाब मांगा। दरअसल, जुलाई के एक प्रस्ताव और परिपत्र को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बीसीआई ने चुनाव संपन्न होने के बाद निर्वाचित राज्य बार काउंसिलों की संरचना में बदलाव किया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी मोहना की पीठ ने उत्तराखंड राज्य बार काउंसिल के निर्वाचित सदस्यों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी की दलीलों पर ध्यान दिया। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय और बीसीआई को नोटिस जारी किया।
कुलदीप कुमार और नौ अन्य निर्वाचित सदस्यों की ओर से वकील ध्रुव जोशी के माध्यम से दायर याचिका में बीसीआई के 19 जुलाई के प्रस्ताव और उसके परिणामस्वरूप 21 जुलाई के परिपत्र को रद्द करने की मांग की गई थी। इसमें कहा गया है कि ये उपाय अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 3(2)(बी) के विरुद्ध हैं और संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन करते हैं।
याचिका के अनुसार, उत्तराखंड राज्य बार काउंसिल के चुनाव सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार गठित एक उच्चस्तरीय चुनाव समिति की देखरेख में आयोजित किए गए थे। इसमें कहा गया है कि चुनाव परिणाम 28 फरवरी को घोषित किए गए थे और 13 मार्च को उत्तराखंड राजपत्र में आधिकारिक रूप से अधिसूचित किए गए थे, जिससे निर्वाचित सदस्यों को पद ग्रहण करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त हुआ।
इसमें कहा गया है कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 3(2)(बी) राज्य बार काउंसिल के लिए अधिकतम 25 निर्वाचित सदस्यों का प्रावधान करती है, जहां मतदाताओं की संख्या 10,000 अधिवक्ताओं से अधिक हो।
याचिका में कहा गया है कि बीसीआई के बाद के प्रस्ताव में, जो महिलाओं के प्रतिनिधित्व को सुविधाजनक बनाने के लिए ऐसे राज्यों में अधिकतम 32 सदस्यों की संरचना का प्रावधान करता है, संसद द्वारा किसी भी संशोधन या सर्वोच्च न्यायालय से विशिष्ट प्राधिकरण के बिना प्रभावी रूप से वैधानिक संरचना को बढ़ाता है।
इसमें कहा गया है कि बीसीआई का वह परिपत्र जिसमें पहले से राजपत्रित चुनाव परिणामों के संशोधन और पुनर्प्रकाशन का निर्देश दिया गया है, एक समाप्त हो चुकी चुनावी प्रक्रिया को फिर से खोलने के बराबर है। याचिका में कहा गया है कि उत्तराखंड बार काउंसिल चुनावों में भाग लेने वाले लगभग 11,000 अधिवक्ताओं के लोकतांत्रिक जनादेश और चुनावों की अंतिम वैधता को कमजोर किया गया है।
याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि पीठ ने मौजूदा वैधानिक ढांचे के भीतर 30 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व को लागू करने का निर्देश दिया था, जिसमें 20 प्रतिशत प्रतिनिधित्व चुनावों के माध्यम से और 10 प्रतिशत सह-विकल्प के माध्यम से होना था।
याचिका में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली उच्च-शक्ति चुनाव पर्यवेक्षण समिति द्वारा 23 जुलाई को पारित एक आदेश का भी हवाला दिया गया था, जिसमें याचिका के अनुसार, यह माना गया था कि बीसीआई का प्रस्ताव अधिवक्ता अधिनियम के विपरीत और शीर्ष न्यायालय के पूर्व निर्देशों के साथ असंगत था।
इसमें बीसीआई के प्रस्ताव को उस हद तक रद्द करने की भी मांग की गई है, जिस हद तक यह अधिवक्ता अधिनियम की धारा 3(2)(बी) के तहत निर्धारित सीमा से परे राज्य बार परिषदों की वैधानिक संरचना को बढ़ाने का प्रयास करता है।
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