
नई दिल्ली. भारत (India) और रूस (Russia) की साझेदारी से बनी ब्रह्मोस मिसाइल (BrahMos (missile) दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों (Supersonic cruise missiles) में से एक मानी जाती है. अब इसकी अगली पीढ़ी ब्रह्मोस-2 (BrahMos-2) की चर्चा तेज हो गई है. यह मिसाइल रूसी 3एम22 जिरकॉन हाइपरसोनिक (Zircon Hypersonic) सिस्टम से प्रेरित होकर खास तौर पर विकसित हो सकती है. अगर यह सच साबित होता है, तो इसकी गति मौजूदा ब्रह्मोस के 3704 से दोगुनी यानी7408 km/hr से भी ज्यादा हो सकती है.
ब्रह्मोस-2 की योजना लंबे समय से चल रही है. इसे DRDO और रूस की एनपीओ मशिनोस्ट्रोयेनिया की साझेदारी में ब्रह्मोस एयरोस्पेस के जरिए विकसित किया जा रहा है. रिपोर्ट्स कहती हैं कि इसमें रूसी स्क्रैमजेट इंजन की तकनीक लगाई जा सकती है, जो जिरकॉन मिसाइल में इस्तेमाल होती है.
जिरकॉन पहले से रूसी नौसेना में सेवा दे रही है. हाइपरसोनिक गति से उड़ान भरती है. भारतीय पक्ष इसमें अपने इलेक्ट्रॉनिक्स, गाइडेंस सिस्टम और सीकर तकनीक जोड़ने की बात कही जा रही है. इससे मिसाइल निर्यात के अनुकूल बनेगी और कई प्लेटफॉर्म- जैसे जहाज, पनडुब्बी और जमीन से लॉन्च की जा सकेगी. हाइपरसोनिक गति का मतलब है कि मिसाइल दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का समय बहुत कम देगी. कुछ रिपोर्ट्स में रेंज 1500 किलोमीटर तक बताई गई है, लेकिन ये आंकड़े अभी आधिकारिक नहीं हैं.
देरी और चुनौतियां क्यों?
यह परियोजना लगभग 20 साल पुरानी है, लेकिन पहली उड़ान परीक्षण अभी तक नहीं हुआ. मुख्य बाधाएं तीन हैं- उच्च लागत, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में दिक्कतें और सैन्य सेवाओं की प्राथमिकता. एक ब्रह्मोस-2 की अनुमानित कीमत मौजूदा ब्रह्मोस की लगभग तीन गुना यानी करीब 12.5 मिलियन डॉलर हो सकती है.
रूस पूर्ण स्क्रैमजेट तकनीक देने में हिचक दिखा रहा है, जिससे लागत और निर्भरता दोनों बढ़ रही है. ब्रह्मोस एयरोस्पेस फिलहाल हल्के ब्रह्मोस-एनजी को प्राथमिकता दे रहा है, जो तेजस और मिग-29 जैसे विमानों के लिए है. इसलिए ब्रह्मोस-2 के फ्लाइट टेस्ट 2027-28 से पहले होने की उम्मीद कम है.
ब्रह्मोस पहले ही फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों को निर्यात हो चुकी है. ब्रह्मोस-2 को इसी सफलता को आगे बढ़ाने के लिए बनाया जा सकता है. भारतीय तकनीक जोड़ने से यह ‘मेक इन इंडिया’ के अनुरूप भी रहेगा. हालांकि अभी कोई आधिकारिक पुष्टि, स्पेसिफिकेशन या टाइमलाइन घोषित नहीं हुई है. ये सब विश्लेषकों की रिपोर्ट्स और अनुमान पर आधारित हैं.
कुल मिलाकर, ब्रह्मोस-2 भारत-रूस रक्षा सहयोग का नया अध्याय खोल सकता है. अगर यह हाइपरसोनिक क्षमता के साथ तैयार होती है, तो यह क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को मजबूत करेगी. लेकिन लागत, तकनीक हस्तांतरण और परीक्षणों की चुनौतियों को पार करना जरूरी होगा.
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