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‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ कहने पर भड़का सुप्रीम, अब ट्रेन हादसे में मृत यात्री के परिवार को मिलेगा 8 लाख मुआवजा

July 18, 2026

नई दिल्ली। ट्रेन हादसे (Train accident) में जान गंवाने वाले एक यात्री (Passenger) के लिए कानूनी दस्तावेजों में इस्तेमाल किए गए ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ (Second-class Passenger) शब्द पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि यह शब्द भारत के सामाजिक इतिहास में मौजूद वर्ग विभाजन की भावना को दर्शाता है और संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।

एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को मृतक यात्री के परिवार को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल टिकट नहीं मिलने के आधार पर किसी व्यक्ति को वैध यात्री मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।

कोच ‘सेकंड क्लास’ हो सकता है, यात्री नहीं
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने 19 पन्नों के फैसले में इस मुद्दे पर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि दस्तावेजों और मैनुअल की समीक्षा के दौरान मृतक के लिए इस्तेमाल किए गए ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर ध्यान गया। कोर्ट ने कहा कि भले ही यह शब्द टिकट की कीमत या यात्रा श्रेणी से जुड़ा हो सकता है, लेकिन ‘क्लास’ शब्द का इस्तेमाल कोच के संदर्भ में होना चाहिए, यात्री की पहचान के रूप में नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश के सामाजिक इतिहास को देखते हुए किसी व्यक्ति को इस तरह संबोधित करना संविधान की भावना के विपरीत है।


  • क्या है पूरा मामला?
    यह मामला वर्ष 2015 का है। चंद्रकांत ठक्कर नामक व्यक्ति की चलती ट्रेन से गिरने के कारण मौत हो गई थी। मृतक की पत्नी ने मुआवजे के लिए रेलवे दावा न्यायाधिकरण (RCT) में याचिका दाखिल की थी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि मृतक के पास से कोई वैध टिकट बरामद नहीं हुआ था। इसके बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी थी।

    पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
    इसके बाद मृतक की पत्नी ने हाईकोर्ट और ट्रिब्यूनल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। याचिका में 4 लाख रुपये मुआवजे के साथ 18 प्रतिशत ब्याज की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके पति बिना टिकट यात्रा नहीं कर रहे थे। टिकट उनके बैग में था, जो हादसे के बाद गायब हो गया और बरामद नहीं हो पाया।

    सुप्रीम कोर्ट ने पलटा निचली अदालतों का फैसला
    सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को बदलते हुए कहा कि शव के पास टिकट नहीं मिलने से किसी व्यक्ति का वैध यात्री होने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता। अदालत ने अपने पुराने फैसलों रीना देवी और डोली रानी साहा बनाम भारत सरकार मामलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल टिकट नहीं मिलने के आधार पर मुआवजा रोकना उचित नहीं है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को मृतक की पत्नी को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

    यात्रियों की सुरक्षा पर भी कोर्ट की टिप्पणी
    मुआवजा देने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यात्रियों को अपनी सुरक्षा को लेकर भी सतर्क रहने की सलाह दी। अदालत ने कहा कि सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी केवल रेलवे की नहीं हो सकती, यात्रियों की भी अपनी जिम्मेदारी होती है। कई बार लोग ट्रेन पकड़ने या जल्दबाजी में अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं, जिससे गंभीर हादसे होते हैं। कोर्ट ने कहा कि आर्थिक और व्यावहारिक परेशानियों के बीच भी लोगों को अपने जीवन की सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिए।

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