
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की नई त्रिभाषा नीति (Three-Language Policy) पर तत्काल रोक लगाने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी नई भाषा का अध्ययन करना विद्यार्थियों (Students) के लिए कभी नुकसानदायक नहीं होता। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया कि क्या अंग्रेजी (English) को भारतीय भाषा के रूप में देखा जा सकता है। शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी ने नई शिक्षा नीति के तहत लागू भाषा व्यवस्था को लेकर चल रही बहस को नया आयाम दे दिया है। फिलहाल अदालत ने नीति पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए मामले की विस्तृत सुनवाई आगामी सप्ताह के लिए निर्धारित की है।
नई शिक्षा व्यवस्था के तहत शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा नौ के विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है। इस व्यवस्था में कम से कम दो भाषाएं भारतीय भाषाएं होना आवश्यक है। इसी प्रावधान को चुनौती देते हुए दायर याचिकाओं में कहा गया कि कई विद्यार्थियों को उन भाषाओं को छोड़ना पड़ सकता है जिन्हें वे प्राथमिक कक्षाओं से लगातार पढ़ते आ रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस बदलाव से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होगी और कई स्कूलों में आवश्यक संसाधनों की भी कमी है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी तर्क रखा गया कि अनेक स्कूलों में सभी भारतीय भाषाओं के लिए प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा कई भाषाओं की पाठ्यपुस्तकें भी समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। उनका कहना था कि यदि किसी छात्र को अपनी पसंद की भारतीय भाषा पढ़नी हो, तो अधिकांश विद्यालयों में उसके लिए शिक्षक और अध्ययन सामग्री मौजूद नहीं है। ऐसे में छात्रों के सामने व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न होंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों पर विचार करते हुए कहा कि किसी भाषा का ज्ञान हमेशा उपयोगी होता है और बहुभाषी शिक्षा विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास में सहायक बन सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि स्थानीय भाषाओं की परिभाषा और अंग्रेजी की स्थिति जैसे मुद्दों पर गंभीर विचार की आवश्यकता हो सकती है। हालांकि, बिना विस्तृत सुनवाई के नीति पर रोक लगाने का कोई आधार फिलहाल अदालत को नहीं मिला।
केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि सरकार और सीबीएसई निर्धारित समय के भीतर अपना विस्तृत जवाब प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद अदालत सभी पक्षों की दलीलों पर विस्तार से विचार करेगी। मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को निर्धारित की गई है, जहां नीति के संवैधानिक और व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत लागू त्रिभाषा व्यवस्था का उद्देश्य विद्यार्थियों में बहुभाषी क्षमता विकसित करना, भारतीय भाषाओं के संरक्षण को बढ़ावा देना और सांस्कृतिक विविधता को मजबूत करना बताया गया है। नीति के अनुसार किसी भी राज्य पर कोई विशेष भाषा अनिवार्य रूप से नहीं थोपी जाएगी और विद्यार्थियों को निर्धारित विकल्पों में से भाषा चुनने की स्वतंत्रता दी जाएगी। नौवीं कक्षा से दो भारतीय भाषाओं के साथ एक विदेशी भाषा का अध्ययन करने का प्रावधान किया गया है, जबकि जो विद्यार्थी वर्तमान शैक्षणिक सत्र में दसवीं कक्षा में हैं, वे पूर्व व्यवस्था के अनुसार दो भाषाओं का ही अध्ययन जारी रखेंगे। अब इस पूरी व्यवस्था की संवैधानिक वैधता और व्यावहारिक चुनौतियों पर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का इंतजार रहेगा।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved