
नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा में कुछ गीत ऐसे होते हैं जो सिर्फ संगीत (Music) नहीं बल्कि जिंदगी की सीख बन जाते हैं। “किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार” ऐसा ही एक गीत है, जिसे सुनते ही इंसानियत, प्रेम और त्याग की भावना मन में उतर जाती है। इस अमर गीत को लिखने वाले शैलेंद्र (Shailendra) का जीवन भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। बेहद साधारण परिवार से आने वाले शैलेंद्र (Shailendra) ने संघर्षों के बीच अपनी पहचान बनाई और अपने शब्दों से करोड़ों दिलों (Millions Of Hearts) को छू लिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि फिल्मों में आने से पहले वह रेलवे वर्कशॉप में मैकेनिक (Railway Workshop Mechanic) के तौर पर काम करते थे। मशीनों और औजारों के बीच जिंदगी गुजारने वाला यह युवक आगे चलकर हिंदी सिनेमा का सबसे संवेदनशील गीतकार (Sensitive Lyricist) बन गया।
शैलेंद्र का जन्म वर्ष 1923 में रावलपिंडी में हुआ था। उनका असली नाम शंकरदास केसरीलाल था। परिवार आर्थिक रूप से मजबूत नहीं था, इसलिए बचपन से ही उन्होंने कठिन परिस्थितियों को करीब से देखा। बाद में उनका परिवार उत्तर भारत आकर बस गया। पढ़ाई में तेज होने के बावजूद हालात ऐसे थे कि उन्हें जल्दी नौकरी करनी पड़ी। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया और रेलवे में मैकेनिक की नौकरी शुरू कर दी। हालांकि उनका मन मशीनों में कम और शब्दों में ज्यादा लगता था। काम के बाद वह कविताएं लिखते और साहित्यिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। धीरे-धीरे उनकी लेखनी लोगों के बीच पहचान बनाने लगी।
शैलेंद्र की कविताओं में आम आदमी का दर्द, संघर्ष और उम्मीद साफ दिखाई देती थी। यही वजह थी कि उनके शब्द सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचते थे। एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान उनकी मुलाकात राज कपूर से हुई। राज कपूर उनकी कविता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने फिल्मों के लिए गीत लिखने का प्रस्ताव दिया। शुरुआत में शैलेंद्र ने मना कर दिया, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें फिल्मों की ओर आने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बाद हिंदी सिनेमा को एक ऐसा गीतकार मिला, जिसने हर भावना को बेहद सादगी और गहराई से शब्द दिए।
“आवारा हूं”, “मेरा जूता है जापानी”, “प्यार हुआ इकरार हुआ”, “दोस्त दोस्त ना रहा” और “सब कुछ सीखा हमने” जैसे गीत आज भी लोगों की जुान पर हैं। उनके गीतों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उनमें दिखावा नहीं बल्कि सच्चाई होती थी। वह कठिन भावनाओं को भी बेहद आसान शब्दों में व्यक्त कर देते थे। यही कारण है कि उनके गीत हर वर्ग के लोगों को अपने लगते थे। प्रेम, दर्द, अकेलापन और उम्मीद जैसी भावनाओं को उन्होंने जिस संवेदनशीलता से लिखा, वह आज भी मिसाल मानी जाती है।
शैलेंद्र का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा रहा। आर्थिक तंगी और जिम्मेदारियों का बोझ उनके साथ हमेशा बना रहा। कहा जाता है कि पत्नी से दूर रहने का दर्द भी उनके कई गीतों में झलकता था। सफलता मिलने के बाद भी उन्होंने अपनी सादगी नहीं छोड़ी। वह हमेशा जमीन से जुड़े रहे और आम आदमी की भावनाओं को ही अपनी लेखनी का आधार बनाया। यही वजह है कि उनके लिखे गीत समय के साथ पुराने नहीं हुए।
सिर्फ 43 साल की उम्र में शैलेंद्र इस दुनिया को छोड़कर चले गए, लेकिन उनके गीत आज भी जिंदा हैं। उन्होंने साबित किया कि महान बनने के लिए बड़े साधन नहीं बल्कि संवेदनशील दिल और सच्चे शब्द चाहिए होते हैं। एक मैकेनिक से महान गीतकार बनने तक का उनका सफर आज भी लाखों लोगों को प्रेरणा देता है।
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