
नई दिल्ली ।अमेरिका (America) की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) में इन दिनों रामकथा (Ram Katha) का आयोजन हो रहा है। आध्यात्मिक गुरु मोरारी बापू (Morari Bapu) की नौ दिवसीय रामकथा (Ram Katha) 15 अगस्त से सैंडर्स थिएटर (Sanders Theatre) में शुरू हुई है और इसका समापन 23 अगस्त को होगा। इस आयोजन में भारत के अलग-अलग प्रमुख तीर्थस्थलों (Pilgrimage Sites) से साधु-संत, विद्वान और अन्य लोग शामिल हो रहे हैं।
रामकथा का आयोजन सावन के महीने में तुलसी जयंती के संदर्भ में किया गया है। इस दौरान 16 से 18 अगस्त तक तीन दिनों की विद्वत चर्चा भी आयोजित की गई। कार्यक्रम में रामकथा की परंपरा, उसके आध्यात्मिक पक्ष और भारतीय संस्कृति में इसके महत्व से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
मोरारी बापू ने आयोजन के दौरान सत्य, प्रेम और करुणा को विशेष महत्व दिया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में प्रज्ज्वलित की गई ज्योति को ज्ञान दीप के बजाय प्रेम ज्योति के रूप में देखा जाना चाहिए। रामकथा के माध्यम से इन मूल्यों को व्यापक स्तर पर सामने रखने का प्रयास किया जा रहा है।
कार्यक्रम में हार्वर्ड के दक्षिण एशिया अध्ययन से जुड़े शिक्षाविदों की भी भागीदारी रही। राम, सीता और लक्ष्मण की वनवास यात्रा को भारतीय तीर्थ परंपरा के संदर्भ में समझाने का प्रयास किया गया। अयोध्या से शुरू हुई राम की 14 वर्षों की यात्रा प्रयाग, चित्रकूट, पंचवटी और किष्किंधा से होते हुए रामेश्वरम तक पहुंचने की कथा से जुड़ी है।
रामकथा में शामिल विद्वानों ने बताया कि इन स्थानों का भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में विशेष महत्व है। राम के वनवास से जुड़े स्थलों को सदियों से श्रद्धालु तीर्थ के रूप में देखते आए हैं। इसी परंपरा ने भारत के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भी रामकथा और रामलीला की परंपराओं को प्रभावित किया।
इस आयोजन के दौरान 19 अगस्त को गोस्वामी तुलसीदास की जयंती भी मनाई गई। तुलसीदास ने रामचरितमानस के माध्यम से रामकथा को जनभाषा में व्यापक समाज तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तुलसी जयंती का आयोजन रामचरितमानस और रामकथा की परंपरा के संरक्षण से भी जोड़ा गया।
मोरारी बापू की ओर से वर्ष 2010 में तुलसी जयंती के अवसर पर इस तरह के कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। इसके पीछे रामकथा और रामचरितमानस की परंपरा को आगे बढ़ाने का उद्देश्य बताया गया है। समय के साथ ऐसे आयोजन भारत से बाहर भी विभिन्न प्रतिष्ठित स्थानों पर किए गए हैं।
हार्वर्ड में आयोजित रामकथा में अयोध्या, चित्रकूट और वाराणसी से आए साधु-संतों और विद्वानों की मौजूदगी को विशेष महत्व दिया जा रहा है। इससे भारतीय धार्मिक परंपरा और वैश्विक अकादमिक वातावरण के बीच संवाद का अवसर भी बन रहा है।
कार्यक्रम से जुड़े लोगों के अनुसार, यह आयोजन एक ओर भारत की प्राचीन कथा और पाठ परंपरा को सामने रखता है, वहीं दूसरी ओर दुनिया के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में से एक के परिसर में भारतीय संस्कृति और दर्शन से जुड़े विमर्श को स्थान देता है। रामकथा के दौरान सत्य, प्रेम और करुणा जैसे मूल्यों पर केंद्रित चर्चा को प्रमुखता दी जा रही है।
नौ दिनों तक चलने वाला यह आयोजन 23 अगस्त को समाप्त होगा। इसके दौरान रामकथा, विद्वत चर्चा और तुलसी जयंती से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिक और साहित्यिक परंपरा के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा जा रहा है।
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