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UGC बिल 2026 बना विवाद की वजह! सवर्ण समाज का विरोध, बृजभूषण शरण सिंह के बयान के 5 बड़े पॉइंट

January 26, 2026

नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(University Grants Commission) ( UGC ) की ओर से लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों(Higher education institutions) में समानता को बढ़ावा देने के नियम-(Education Institutions) 2026’ को लेकर विवाद गहरा गया है। उत्तर प्रदेश(Uttar Pradesh) से लेकर उत्तराखंड(Uttarakhand) तक विवाद की गूंज सुनाई दे रही है। सवर्ण समाज इस बिल के विरोध में खड़ा हो गया है। समानता को बढ़ावा देने और जातीय भेदभाव को खत्म करने वाले कानून को बड़े स्तर असमानता का कानून होने की दलील दी जा रही है। इसको लेकर लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले यूपी में पुलिस भर्ती परीक्षा में पेपर लीक का मामला ऐसा गरमाया था, युवा वर्ग नाराज हो गया।

युवाओं की नाराजगी का खामियाजा उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनावी रिजल्ट में भुगतना पड़ा। युवा वर्ग को नाराज करने का जोखिम सरकार लेने के मूड में नहीं दिख रहा है। वहीं, कानून को लेकर जब पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि अभी इसका अध्ययन कर रहा हूं। जो बोलूंगा, सोच-समझकर बोलूंगा। इससे साफ है कि सीनियर भाजपा नेता भी इस मामले में कोई भी बयान देने से बचते दिख रहे हैं।

1. क्यों हो रहा है विरोध?
यूजीसी की ओर से यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर जातीय भेदभाव को खत्म करने के लिए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू किया गया हैं। 15 जनवरी 2026 से यह रेगुलेशन पूरे देश में यूजीसी से संबद्ध सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों प्रभावी हुआ है। सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों और समूहों ने इसके लागू होने के बाद ही विरोध शुरू किया था। दरअसल, नए रेगुलेशन में ओबीसी को भी जातीय भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया।

एससी और एसटी छात्रों को पहले से ही कई अधिकार मिले हुए थे। वे भी इस दायरे में आ गए हैं। नए कानून के तहत इनके साथ-साथ ओबीसी छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायत सक्षम पदाधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकते हैं।

2. नए कोषांग के गठन के निर्देश
यूजीसी ओर से लागू किए गए रेगुलेशन के तहत यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर नए कोषांग का गठन किया जाना है। समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन हर संस्थान में एससी, एसटी और ओबीसी छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों के लिए किया जाना है। यूनिवर्सिटी लेवल पर समानता समिति होगी। इसमें एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिध सदस्य के तौर पर शामिल किए जाने हैं। हर छह माह में यह समिति रिपोर्ट तैयार कर यूजीसी को भेजेगी। इसके आधार पर यूनिवर्सिटी और कॉलेज की स्थिति को मापा जाएगा।

3. सवर्ण समाज का विरोध क्यों?
मामले में सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस कानून में कोई भी एससी, एसटी, ओबीसी छात्र, शिक्षक या शिक्षकेतर कर्मचारी हमारे खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। इसके बाद हमें अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। बड़े स्तर पर इस नियम का दुरुपयोग किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों में कुलपति और कॉलेजों में प्राचार्य सभी छात्रों की शिकायतों पर जब सुनवाई करते हैं तो फिर नई व्यवस्था से असमानता ही फैलेगी। सवर्ण वर्ग को अलग-थलग किए जाने की साजिश के तौर पर इस कानून को पेश किया जा रहा है।

सवर्ण समाज की ओर से अपनी बात को उठाने के लिए यूनवर्सिटी स्तर पर फोरम तैयार किए गए हैं। इन फोरम का कहना है कि ओबीसी को यूनवर्सिटी में एडमिशन में आरक्षण 1990 से मिल रहा है। फैकल्टी नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था वर्ष 2010 से है। ऐसे में नए कानून से सवर्ण समाज को और अधिक दबाने की कोशिश की जा रही है।

4. यति नरसिंहानंद से गरमाया विवाद
मामले को लेकर पिछले दिनों डासना देवी मंदिर के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने की योजना बनाई। इसके लिए वे लाव-लश्कर के साथ गाजियाबाद से निकले तो दिल्ली बॉर्डर पर उन्हें रोक दिया गया। उन्होंने इस मुद्दे पर कहा कि हर वर्ग की बात हो रही है, लेकिन ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार और अन्य सवर्ण समाज के लोगों की बात क्यों नहीं की जा रही। उनके हितों की बात कहां होगी। अगर उनके साथ कुछ गलत होता है तो वे कहां पर शिकायत करेंगे। इस प्रकार के कानून उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक माहौल को खराब करेंगे।

  • 5. कानून वापस लिए जाने की चर्चा
    यूजीसी कानून का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनावी साल से पहले विरोध को गहराता देख अब यूजीसी के स्तर पर इस कानून को लेकर विचार होने की बात कही जा रही है। माना जा रहा है कि यूजीसी इस कानून को वापस ले सकता है। इसके कड़े विरोध ने सरकार को अपनी इस नीति पर दोबारा विचार करने को मजबूर किया है।

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