वॉशिंगटन। अमेरिका और सऊदी अरब (The United States and Saudi Arabia) के बीच हुए नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने बड़ा राजनीतिक संकेत दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह समझौता पूरी तरह प्रभावी तभी होगा, जब सऊदी अरब इजरायल को औपचारिक मान्यता देगा और 2020 के अब्राहम समझौते में शामिल होगा। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का समर्थन करता है, लेकिन परमाणु सामग्री के संवर्धन (Uranium enrichment) की अनुमति नहीं दी जाएगी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर जारी अपने संदेश में ट्रंप ने कहा कि समझौते का उद्देश्य केवल असैन्य परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को बढ़ावा देना है और इसकी अंतिम मंजूरी सऊदी अरब के इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने पर निर्भर करेगी।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार, इस नागरिक परमाणु समझौते से अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में तकनीक, विशेषज्ञता और अन्य सेवाएं उपलब्ध कराने का अवसर मिलेगा। समझौते के जरिए दोनों देश ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम करेंगे।
हालांकि, इस समझौते को लेकर कुछ विशेषज्ञों ने पश्चिम एशिया में परमाणु प्रसार को लेकर चिंता भी जताई है। ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि यह कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण होगा और इसमें सैन्य उपयोग या संवर्धित परमाणु सामग्री की अनुमति नहीं होगी।
दूसरी ओर, सऊदी अरब पहले ही साफ कर चुका है कि वह इजरायल के साथ राजनयिक संबंध तभी स्थापित करेगा, जब फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन की दिशा में ठोस और स्पष्ट प्रगति होगी।
वहीं, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सार्वजनिक रूप से स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की अवधारणा का विरोध करते रहे हैं। ऐसे में ट्रंप की नई शर्त ने इस समझौते को सीधे मध्य पूर्व की जटिल राजनीति से जोड़ दिया है।
राष्ट्रपति ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में हुए 2020 के अब्राहम समझौते को अपनी प्रमुख कूटनीतिक उपलब्धियों में गिनते हैं। इसी समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुछ अन्य अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे।
अब ट्रंप चाहते हैं कि सऊदी अरब भी इस पहल का हिस्सा बने, जिससे क्षेत्रीय रणनीतिक सहयोग और मजबूत हो सके।
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए इस परमाणु सहयोग समझौते को अब समीक्षा और मंजूरी के लिए अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष रखा जाएगा।
रिपोर्टों के मुताबिक, यह ‘123 एग्रीमेंट’ करीब 30 वर्षों के लिए प्रस्तावित है। इसके तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब के नागरिक परमाणु कार्यक्रम के विकास में तकनीकी सहयोग देंगी। हालांकि, समझौते में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अतिरिक्त निगरानी प्रोटोकॉल को शामिल नहीं किए जाने की भी चर्चा है, जिसे लेकर कुछ विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि सऊदी अरब ट्रंप की शर्त स्वीकार करता है, तो यह केवल परमाणु सहयोग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पश्चिम एशिया की कूटनीति, इजरायल-सऊदी संबंधों और फिलिस्तीन मुद्दे पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है। वहीं, यदि रियाद अपनी मौजूदा नीति पर कायम रहता है, तो समझौते के पूर्ण क्रियान्वयन में देरी या नई वार्ताओं की आवश्यकता पड़ सकती है।
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