
उज्जैन। धार्मिक नगरी उज्जैन में वाहन चोरी अब संगठित अपराध का रूप ले चुकी है। हर साल 500 से अधिक वाहन चोरी हो रहे हैं। यदि इनकी कीमत का अनुमान लगाया जाए तो कीमत तीन करोड़ रुपए से ज्यादा होती है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से बड़ी संख्या में वाहन बरामद नहीं हो पाते। यानी, चोरी के बाद वाहन सीधे उज्जैन की सीमा से गायब हो जाते हैं और पुलिस की पकड़ से बाहर निकल जाते हैं।
उज्जैन जिले के आंकड़े देखें तो हर महीने औसतन 40 से 50 वाहन चोरी हो रहे हैं। पिछले 5 महीने यानी, जनवरी 2026 से मई के बीच लगभग 250 वाहन चोरी हुए हैं। इनमें से 90 फीसदी दोपहिया वहन हैं। यदि यही रफ्तार रही तो यह साल खत्म होते-होते आंकड़ा 500 के पार पहुँच जाएगा। एक दोपहिया वाहन की औसत कीमत 60 हजार रुपए मानी जाए, इस हिसाब से 500 से वाहन 3 करोड़ रुपए के होते हैं। चोरी के हॉटस्पॉट चिह्नित होने के बाद भी इन इलाकों में न तो पर्याप्त पेट्रोलिंग हैं न निगरानी का इंतजाम। ऐसे में लोगों को चोरी गए वाहन वापस मिल भी नहीं मिल पाते हैं।
जहाँ कैमरे नहीं वहाँ से जा रहे चोर
उल्लेखनीय है कि शहर में पुलिस ने लगभग 400 कैमरे लगाए गए हैं। इनमें से 50 से ज्यादा बंद पड़े हैं। कई पुराने होने से फुटेज सही नहीं आते। ऐसे में वारदात के बाद पुलिस के पास ठोस सुराग नहीं मिल पाते। कई मामलों में फुटेज ही नहीं मिलती, जिससे जाँच शुरुआत में ही कमजोर पड़ जाती है और चोर पकड़ में नहीं आ पाते। वहीं जिन मार्गों पर कैमरे नहीं है चोर उन्हीं सड़कों से वाहन ले जा रहे हैं।
ग्रामीण इलाकों में बेची जा रही चोरी की गाडिय़ाँ
पुलिस जाँच में सामने आया है कि चोरी किए गए ज्यादातर दोपहिया वाहन देवास और शाजापुर के ग्रामीण इलाकों में खपा दिए जाते हैं। यहाँ बिना कागजों के सस्ते दामों में बाइक बेच दी जाती हैं। कई बार वाहनों के पुर्जे अलग-अलग करके भी बेचे जाते हैं, जिससे उनकी पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
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