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ईरान से जंग और सऊदी अरब को छूट, परमाणु के मुद्दे पर डबल गेम खेल रहा US

July 22, 2026

डेस्क: ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाने वाला अमेरिका अब सऊदी अरब के साथ परमाणु ऊर्जा समझौते को आगे बढ़ाने की तैयारी में है. यही वजह है कि एक बार फिर अमेरिका की नीति पर सवाल उठ रहे हैं. एक तरफ वॉशिंगटन का कहना है कि ईरान का यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब को ऐसा समझौता देने की तैयारी है जिसमें पहले जैसी सख्त शर्तें शामिल नहीं हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका परमाणु नीति पर पक्षपात कर रहा है?

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका सऊदी अरब के साथ ‘123 एग्रीमेंट’ पेश करने जा रहा है, जिससे वह सऊदी को परमाणु ऊर्जा (न्यूक्लियर पावर) तकनीक और उससे जुड़ा सहयोग दे सके. इसका मकसद बिजली उत्पादन के लिए परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं विकसित करना है. लेकिन इस बार इस समझौते में वह ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ (Gold Standard) शामिल नहीं है, जिसे अमेरिका अब तक सबसे मजबूत सुरक्षा शर्त मानता रहा है.

यह समझौता अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब के सिविल परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में भागीदारी की अनुमति देगा. हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समझौते में वो कड़े सुरक्षा प्रावधान शामिल नहीं हैं, जिन्हें अमेरिका अब तक परमाणु प्रसार रोकने के लिए जरूरी मानता रहा है. अगर यह शर्त नहीं होगी, तो भविष्य में सऊदी अरब के पास ऐसी तकनीक और क्षमता आ सकती है, जिसका इस्तेमाल वह न्यूक्लियर हथियार कार्यक्रम की दिशा में भी कर सकता है. यही वजह है कि इस समझौते को लेकर चिंता जता रहे हैं.


  • 123 एग्रीमेंट अमेरिकी एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1954 की धारा 123 के तहत होने वाला परमाणु सहयोग समझौता है. इसके जरिए अमेरिका किसी दूसरे देश के साथ सिविल न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, ईंधन और तकनीकी सहयोग कर सकता है. लेकिन आमतौर पर ऐसे समझौतों में यह शर्त होती है कि संबंधित देश परमाणु हथियार बनाने की दिशा में इस्तेमाल हो सकने वाली गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करेगा. अमेरिका सालों से ईरान पर यह कहकर बैन लगाता रहा है कि वह यूरेनियम संवर्धन कर रहा है और परमाणु हथियार बना सकता है.

    रॉयटर्स के अनुसार, प्रस्तावित समझौते में तथाकथित ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ शामिल नहीं है. इसका मतलब है कि सऊदी अरब पर यूरेनियम संवर्धन और इस्तेमाल किए गए परमाणु ईंधन के रीप्रोसेसिंग पर स्पष्ट रोक नहीं होगी. इसके अलावा IAEA का एडिशनल प्रोटोकॉल भी इसमें शामिल नहीं है. एडिशनल प्रोटोकॉल एक अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था है, जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र की परमाणु एजेंसी IAEA (International Atomic Energy Agency) को किसी देश के परमाणु कार्यक्रम की ज्यादा सख्ती से निगरानी करने का अधिकार मिलता है.

    सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने 2018 में साफ कहा था कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है, तो सऊदी अरब भी जल्द से जल्द परमाणु हथियार विकसित करेगा. उनका यह बयान आज फिर चर्चा में है, क्योंकि अमेरिका अब उसी देश के साथ परमाणु सहयोग बढ़ाने की तैयारी कर रहा है. सऊदी अरब का कहना है कि वह भविष्य में यूरेनियम संवर्धन का अधिकार अपने पास रखना चाहता है. यानी वह इस तकनीक पर पूरी तरह रोक लगाने के पक्ष में नहीं है.

    अगर सऊदी का परमाणु कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ता है, तो ईरान अपने कार्यक्रम को और मजबूत करने की कोशिश कर सकता है. इससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है. यह डील सिर्फ परमाणु ऊर्जा की नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी की भी निशानी है. इससे अमेरिका और सऊदी के रिश्ते और मजबूत होंगे, जबकि ईरान खुद को क्षेत्र में और ज्यादा घिरा हुआ महसूस कर सकता है.

    समझौता जल्द अमेरिकी कांग्रेस में पेश किया जा सकता है. एक सूत्र के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन इसे बुधवार को ही पेश कर सकता है, जबकि दूसरे सूत्र का कहना है कि इसमें करीब एक हफ्ते का समय लग सकता है. अमेरिकी कांग्रेस में भी इस समझौते को लेकर चिंता है. कई डेमोक्रेट सांसदों के साथ-साथ कुछ रिपब्लिकन नेता भी मानते हैं कि सऊदी अरब के साथ किसी भी परमाणु समझौते में कड़े सुरक्षा प्रावधान होने चाहिए. इनमें मौजूदा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भी शामिल हैं, जिन्होंने सीनेटर रहते हुए ऐसी सुरक्षा शर्तों की वकालत की थी.

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