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वर्तमान तकनीक से सबसे पास के तारे तक पहुंचने में लगेंगे 6 हजार साल, नए तरीकों पर हो रही खोज

मेलबर्न। इंसान को सबसे नजदीकी तारे तक जाने के लिए दुनिया का सबसे तेज स्पेसक्राफ्ट(fastest spacecraft) बनाने में करीब हजार साल और लगेंगे. जो कुछ घंटों में कई प्रकाश वर्ष की यात्रा कर सके. द ब्रेकथ्रू इंस्टीट्यूट (The Breakthrough Institute) अब ऐसी संभावनाएं खोज रहा है जिससे इंसान सदियों में नहीं दशकों में नजदीकी तारे या प्लैनेटरी सिस्टम (planetary system) तक पहुंच सके. जर्नल ऑफ द ऑप्टिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका बी (Journal of The Optical Society of America B) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान टेक्नोलॉजी से बाहर की सोच ही हमारे स्पेस ट्रैवल के समय को कम कर सकती है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक जितना बड़ा यान होगा, उसे स्पेस में ट्रैवल करने में उतनी ही ज्यादा मुश्किल आएगी. ये उस समय की बात हो रही है जब यान प्रकाश की गति से उड़े तब. क्योंकि इस गति में उड़ने वाले स्पेसक्राफ्ट के अंदर भार ईंधन घर्षण से पैदा हुई गर्मी की वजह से विस्फोट कर सकता है. हमारी धरती के सबसे नजदीक अगर कोई तारा या प्लैनेटरी सिस्टम है तो वह है अल्फा सेंटौरी (Alpha Centauri).

अल्फा सेंटौरी (Alpha Centauri) धरती से 4.37 प्रकाश वर्ष दूर है. अगर वर्तमान टेक्नोलॉजी की मदद से इंसान इस जगह तक जाने का प्रयास करे तो उसे कम से कम 6000 साल लगेंगे. ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में एप्लाइड मेट्रोलॉजी के पोस्टडॉक्टोरल फेलो डॉ. चतुर बंडुतुंगा ने बताया कि अपनी धरती से अल्फा सेंटौरी (Alpha Centauri) तक जाने के लिए हमें आउट ऑफ द बॉक्स सोचना होगा. वर्तमान तकनीक काम नहीं आएगी. हल्के वजन वाले स्पेसक्राफ्ट जा सकते हैं लेकिन उनमें बहुत ज्यादा ताकत की जरूरत होगी. दिक्कत ये होगी कि वो स्पेसक्राफ्ट अकेले इतनी लंबी यात्रा कर पाएगा या नहीं.
बीच में वैज्ञानिकों के मन में एक आइडिया आया कि लेजर से धक्का मारकर किसी अंतरिक्ष यान को तेजी से किसी भी तारे या ग्रहों के सिस्टम तक पहुंचाया जा सकता है. लेकिन इसमें खतरा है कि लेजर की गर्मी और धक्के की वजह से वर्तमान यान कहीं फट न जाए. हालांकि डॉ. चतुर बंडुतुंगा ने बताया कि ये लेजर तकनीक काम नहीं करेगी. क्योंकि इसमें धरती के वायुमंडल का काफी ज्यादा प्रभाव पड़ता है. यह लेजर को यान तक पहुंचने से पहले कमजोर कर देगी.
डॉ. चतुर ने बताया कि टेलिस्कोप वायुमंडलीय बाधाओं को पार करने के लिए एडॉप्टिव ऑप्टिक्स नाम की प्रणाली का उपयोग करते हैं. अगर इसे पलट दिया जाए तो छोटा सा सैटेलाइट जो धरती की तरफ लेजर फेंक कर वायुमंडल की बाधाओं को रियल टाइम नाप सकता है. इससे धरती पर मौजूद लेजर लाइट वायुमंडल के कमजोर हिस्से को चीरता हुआ स्पेसक्राफ्ट तक जा सकता है. इससे अंतरिक्ष यान को अधिक गति मिलेगी.
पहले हुए रिसर्च में यह पता चला है कि इतने ताकतवर लेजर के 100 गीगावॉट ऊर्जा की जरूरत पड़ेगी. जबकि, पूरा अमेरिका एक समय में 450 गीगावॉट बिजली का उपयोग करता है. डॉ. चतुर और उनके साथी डॉ. पॉल शिब्ले ने कहा कि इतनी ऊर्जा की जरूरत सिर्फ 10 मिनट के लिए पड़ेगी. अगर पूरी ताकत से 10 मिनट के लिए लेजर लाइट से यान को धक्का दिया जाए तो यान बहुत दूरी कवर कर सकता है.
इसके लिए एक वर्ग किलोमीटर इलाके में लेजर फेंकने वाले यंत्र लगाने होंगे. ताकि एक साथ 10 करोड़ लेजर लाइट की एक मोटी बीम यान पर पड़े. जैसे ही यान पर यह लेजर लाइट पड़ेगी तो वह प्रकाश की गति के 20 फीसदी हिस्से के बराबर की रफ्तार से अंतरिक्ष में चलेगा. इस गति ये स्पेसक्राफ्ट अल्फा सेंटौरी तक 22 साल में ही पहुंच जाएगा. इसके लिए हजारों साल का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. हालांकि इसमें एक ही दिक्कत है कि लेजर लाइट की वजह से अंतरिक्ष यान पिघले नहीं.
लेजर लाइट से बचने के लिए एक ऐसे मिरर की जरूरत होगी जो अंतरिक्ष में सेट किया जाए. वह 99.99 फीसदी गर्मी सोख ले और सिर्फ ऊर्जा को यान तक ट्रांसफर करे. ताकि यान तेज गति से आगे बढ़ सके. अगर ऐसा होता है तो अंतरिक्षयान कुछ दिनों में ही अल्फा सेंटौरी तक पहुंच सकता है. एक बार अगर ऐसा सिस्टम विकसित कर लिया गया तो अंतरिक्ष किसी भी हिस्से में कुछ ही दिनों में पहुंचा जा सकता है. इसकी मदद से धरती जैसे अन्य ग्रहों की खोज करना भी आसान हो जाएगा.

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