
उज्जैन। एक समय था जब उज्जैन स्टेशन पर बड़ी संख्या में कुली काम करते थे। यात्रियों का सामान उठाने में इनकी अहम भूमिका होती थी, लेकिन आज इन्हीं कुलियों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
अग्निबाण की टीम ने जब उज्जैन स्टेशन पर कुलियों का हाल जाना, तो दर्द छलक कर बाहर आ गया है। वर्तमान में उज्जैन स्टेशन पर 17 कुली है। इन कुलियों का कहना है कि उनकी रोजी-रोटी का सबसे बड़ा दुश्मन ‘ट्रॉली बैगÓ बन गया है। पहले लोग भारी-भरकम अटैची और लोहे के ट्रंक लेकर चलते थे, जिन्हें उठाना मजबूरी थी लेकिन अब बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक, चक्के लगे ट्रॉली बैग को खुद खींचकर ले जाते हैं। एस्केलेटर (स्वचलित सीढिय़ां) और लिफ्ट ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। अब यात्री को कुली की जरूरत महसूस ही नहीं होती। यही कारण है कि उज्जैन रेलवे स्टेशन पर 40 में से मात्र 17 कुली ही काम कर रहे हैं तथा उन्हें भी अपनी रोजी रोटी चलाना मुश्किल हो रहा है। आर्थिक तंगी का आलम यह है कि जो कुली पहले प्रतिदिन 1000 से 2000 रुपये कमा लेते थे, आज वे दिन भर मेहनत करके बमुश्किल 300 से 500 रुपये ही घर ले जा पाते हैं। उज्जैन में अधिकांश ट्रेनें प्लेटफॉर्म नंबर 1 और 8 पर आती हैं। यहाँ से बाहर निकलने के चार रास्ते हैं और दूरी बहुत कम है। यात्री ट्रेन से उतरते हैं और खुद सामान खींचते हुए मिनटों में बाहर निकल जाते हैं।
यात्री सुविधाएं बढ़ीं, मगर हम पिछड़े..
15 साल से उज्जैन रेलवे स्टेशन पर काम कर रहे कुली पठान ने बातचीत के दौरान बताया कि हमारे देखते-देखते उज्जैन का रेलवे स्टेशन बदल गया। स्टेशन पर टाइल्स लग गईं, लिफ्ट लग गई, एस्केलेटर आ गए। यात्रियों के लिए यह विकास है, लेकिन हमारे लिए विनाश है। अब इस काम में जान नहीं बची। दिन भर ताकते रहते हैं, बमुश्किल कुछ सवारियाँ ही मिलती हैं। परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।
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