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विद्रोह के बाद बदला बांग्लादेश का चेहरा: राजनीतिक शून्यता में इस्लामी ताकतों का उभार, लोकतंत्र पर संकट

February 09, 2026

ढाका। बांग्लादेश में जुलाई 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह ने 15 वर्षों से सत्ता में रही शेख हसीना सरकार (Sheikh Hasina government) का अंत कर दिया और देश को एक ऐतिहासिक राजनीतिक संक्रमण (Political Transition) की ओर धकेल दिया। हालांकि, बीआरएसी इंस्टीट्यूट ऑफ गवर्नेंस एंड डेवलपमेंट (BIGD) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस विद्रोह से वह गहरा संरचनात्मक बदलाव नहीं आया, जिसकी व्यापक अपेक्षा की जा रही थी। इसके उलट, बने राजनीतिक शून्य में इस्लामी राजनीति तेजी से मजबूत हुई है।

BIGD की रिपोर्ट ‘विच्छेद, सुधार और लोकतंत्र की पुनर्कल्पना: संक्रमण की पीड़ा से निपटना’ (Rupture, Reform, and Reimagining Democracy: Navigating the Agony of Transition) में कहा गया है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद शासन व्यवस्था, पार्टी प्रणाली और अभिजात वर्ग की संरचना में कोई मौलिक बदलाव नहीं दिखा।



  • ‘बड़ा बदलाव नहीं, बल्कि अव्यवस्थित संक्रमण’

    रिपोर्ट के लेखकों में शामिल डॉ. मिर्जा एम हसन ने निष्कर्षों की व्याख्या करते हुए कहा कि विद्रोह के बाद जिस तरह के गहन सुधारों की उम्मीद की जा रही थी, वे हकीकत में नहीं हुए। हसन के मुताबिक, न तो राजनीतिक प्रणाली में बड़े सुधार आए, न ही नए अभिजात वर्ग का उदय हुआ और न ही कानून का शासन प्रभावी रूप से स्थापित हो सका।

    उन्होंने कहा कि इसके बजाय देश ने अराजक स्थिति, अव्यवस्थित शासन और एक कमजोर अंतरिम सरकार को देखा, जो न तो भीड़तंत्र को नियंत्रित कर सकी और न ही जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को दिशा दे पाई। हसन ने स्पष्ट किया कि इसे क्रांतिकारी परिवर्तन कहना अतिशयोक्ति होगी, क्योंकि यह सत्ता परिवर्तन से अधिक तो है, लेकिन किसी गहरे बदलाव से कम।

    इस्लामी राजनीति को मिला अवसर

    डॉ. हसन ने कहा कि दमनकारी शासन के पतन के बाद उत्पन्न राजनीतिक शून्य ने पहले दबाए गए इस्लामी समूहों को उभरने का मौका दिया।
    उन्होंने बताया कि विभिन्न इस्लामी राजनीतिक दलों और इस्लामी नागरिक समाज संगठनों ने इस अवसर का लाभ उठाया और अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

    उनके अनुसार, पिछले कई दशकों तक बांग्लादेश की राजनीति मध्य-दक्षिणपंथी विचारधारा तक सीमित थी, जिसमें अवामी लीग, बीएनपी और जातीय पार्टी प्रमुख थीं। लेकिन अब राजनीतिक इस्लाम, विशेषकर जमात के उभार के साथ देश की वैचारिक दिशा में बड़ा बदलाव आया है। हसन ने इसे दक्षिणपंथी विचारधारा की निर्णायक जीत बताया।

    महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर असर की चेतावनी

    डॉ. हसन ने चेतावनी दी कि राजनीतिक इस्लाम के उभार का सबसे गहरा असर महिलाओं पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को दक्षिणपंथी ताकतें किसी हद तक आत्मसात कर सकती हैं, लेकिन महिलाओं को नियंत्रित करने की प्रवृत्ति के चलते उनके अधिकारों पर गंभीर खतरा पैदा होगा।

    उन्होंने कहा कि यदि भविष्य की कोई सरकार—चाहे वह बीएनपी हो या जमात—इस स्थिति को संतुलित नहीं कर पाई, तो बांग्लादेश में औपचारिक और अनौपचारिक इस्लामी शासन का पहला अनुभव महिलाओं के लिए नई चुनौतियां और समस्याएं लेकर आएगा। हसन के अनुसार, यही इस पूरे संक्रमण की सबसे दुखद और चिंताजनक कहानी है।

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