ढाका। बांग्लादेश की राजनीति (Politics of bangladesh) में उथल-पुथल थमने का नाम नहीं ले रही है। तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन (Mohammad Shahabuddin) ने देश के पूर्व मुख्य सलाहकार और नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस (Muhammad Yunus) पर संवैधानिक नियमों की अनदेखी समेत कई गंभीर आरोप लगाए हैं।
राष्ट्रपति ने बंगाली दैनिक कलेर कंठो को दिए साक्षात्कार में दावा किया कि यूनुस के नेतृत्व वाले अंतरिम शासन के दौरान उन्हें लगभग “महल का कैदी” बनाकर रखा गया और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
विदेश यात्राओं, नीतिगत फैसलों या अंतरराष्ट्रीय समझौतों की जानकारी उन्हें नहीं दी गई। न्होंने कहा कि मुख्य सलाहकार ने 14–15 विदेश यात्राएं कीं, लेकिन एक बार भी औपचारिक रूप से राष्ट्रपति को अवगत नहीं कराया।
राष्ट्रपति के अनुसार, यह सीधे तौर पर संवैधानिक परंपराओं का उल्लंघन था।
‘डेढ़ साल तक सीमित रखा गया बंगभवन में’
राष्ट्रपति ने यह भी दावा किया कि उन्हें लंबे समय तक राष्ट्रपति भवन बंगभवन तक ही सीमित रखा गया।
कोसोवो और कतर की प्रस्तावित यात्राएं रोकी गईं।
अंतरिम सरकार द्वारा जारी किए गए 133 अध्यादेशों पर भी पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया।
उनका कहना है कि परिस्थितियों में कुछ अध्यादेश जरूरी हो सकते थे, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में निर्णय बिना संस्थागत विमर्श के लेना उचित नहीं था।
राष्ट्रपति को ‘अमेरिका समझौते’ की भी जानकारी नहीं
शहाबुद्दीन ने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले अंतरिम प्रशासन द्वारा अमेरिका के साथ किए गए एक अहम समझौते की जानकारी भी उन्हें नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि पूर्व सरकारों में राष्ट्रपति को हर महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम से अवगत कराया जाता था, जो एक स्थापित संवैधानिक प्रक्रिया है।
उन्होंने 22 अक्टूबर 2024 की रात को “भयानक” बताया, जब बंगभवन के बाहर विरोध प्रदर्शन हुए और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ी।
सेना और विपक्ष ने निभाई भूमिका
राष्ट्रपति ने कहा कि देश की संवैधानिक निरंतरता बनाए रखने में बांग्लादेश सेना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व ने सहयोग किया।
उनके अनुसार, सैन्य नेतृत्व ने उन्हें आश्वस्त किया कि राष्ट्रपति के संवैधानिक पद की रक्षा करना राज्य व्यवस्था की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
राजनीतिक टकराव और बढ़ने के संकेत
इन आरोपों ने बांग्लादेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिम शासन, संवैधानिक अधिकारों और सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल आने वाले समय में देश की राजनीति और संस्थागत संतुलन पर गहरा असर डाल सकते हैं।
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