वॉशिंगटन। भारत (India) ने रूसी तेल आयात पर जारी अमेरिकी छूट को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका (United States) से फिर संपर्क किया है। वैश्विक तेल बाजार में बढ़ते तनाव और (Strait of Hormuz) में जारी संकट के बीच भारत ऊर्जा आपूर्ति को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।
मौजूदा अमेरिकी छूट की अवधि 16 मई की रात समाप्त होने जा रही है। इसी वजह से आशंका जताई जा रही है कि यदि नई राहत नहीं मिली, तो रूस से सस्ते कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। हालांकि रूस पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद वॉशिंगटन लगातार भारत समेत कई देशों पर रूसी तेल खरीद घटाने का दबाव बना रहा है।
भारत ने क्यों बढ़ाई चिंता?
पिछले करीब 75 दिनों से पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री मार्गों में बाधा के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर बना हुआ है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि देश के लिए स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना सर्वोच्च प्राथमिकता है। सरकार को आशंका है कि अगर कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई तो इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों और घरेलू अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक भारतीय रिफाइनरी कंपनियां छूट खत्म होने से पहले तेजी से रूसी तेल खरीद रही हैं। आंकड़ों के अनुसार मई महीने में रूस से कच्चे तेल का आयात करीब 23 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है, जो अब तक का रिकॉर्ड स्तर माना जा रहा है।
हालांकि भारत ने उन रूसी LNG कार्गो को लेने से इनकार कर दिया है जो अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आते हैं। बताया जा रहा है कि रूस से जुड़ा एक LNG शिपमेंट फिलहाल Singapore के पास रुका हुआ है।
भारत के पास कितना है ईंधन भंडार?
Hardeep Singh Puri ने हाल ही में भरोसा दिलाया कि देश में फिलहाल ईंधन की कोई कमी नहीं है। उन्होंने बताया कि भारत के पास इस समय 69 दिनों का LNG और 45 दिनों का LPG स्टॉक उपलब्ध है।
सरकार ने एहतियात के तौर पर एलपीजी उत्पादन भी बढ़ा दिया है। दैनिक उत्पादन को 36 हजार टन से बढ़ाकर 54 हजार टन किया गया है ताकि किसी भी संभावित संकट की स्थिति में घरेलू सप्लाई प्रभावित न हो।
रूस-भारत के बीच लगातार बातचीत
रूसी उप ऊर्जा मंत्री Pavel Sorokin ने हाल ही में नई दिल्ली में हरदीप सिंह पुरी से मुलाकात की थी। माना जा रहा है कि जून में दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को लेकर फिर अहम बातचीत हो सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए और अमेरिकी छूट आगे नहीं बढ़ी, तो वैश्विक तेल बाजार में कीमतों का दबाव और बढ़ सकता है।
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