
नई दिल्ली । हिंदू पंचांग में अधिकमास(Adhik Maas) एक विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण समय माना जाता है, जिसे 13वां अतिरिक्त महीना भी कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह अवधि 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक चलेगी। इस महीने को पुरुषोत्तम मास(Purushottam Month) और मलमास(Malmas) के नाम से भी जाना जाता है, और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह समय भगवान विष्णु(Lord Vishnu) की आराधना, व्रत, जप और दान-पुण्य के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। लेकिन इसके पीछे केवल धार्मिक कारण ही नहीं, बल्कि एक गहरा खगोलीय गणित(Astronomical Mathematics) भी छिपा है, जो सौर और चंद्र कैलेंडर के बीच संतुलन स्थापित करता है।
वास्तव में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अपनी परिक्रमा लगभग 365 दिन और 6 घंटे में पूरी करती है, जिसे सौर वर्ष कहा जाता है। वहीं हिंदू पंचांग मुख्य रूप से चंद्रमा की कलाओं पर आधारित होता है, जिसमें एक वर्ष लगभग 354 दिनों का माना जाता है। इस तरह हर वर्ष सौर और चंद्र कैलेंडर के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर बन जाता है। जब यह अंतर लगातार तीन वर्षों तक जुड़ता है, तो यह लगभग 33 दिनों तक पहुंच जाता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है। इस प्रकार कैलेंडर की गणना संतुलित रहती है और त्योहारों का समय मौसम के अनुसार सही बना रहता है।
अधिकमास का धार्मिक महत्व भी अत्यंत विशेष माना गया है। इस अवधि में कई प्रमुख व्रत और त्योहार आते हैं, जिनका अलग आध्यात्मिक महत्व होता है। वर्ष 2026 में इस महीने की शुरुआत 17 मई को हुई, और इस दौरान बड़ा मंगल, वरदा चतुर्थी, स्कंद षष्ठी, मासिक दुर्गाष्टमी, गंगा दशहरा, पद्मिनी एकादशी, गुरु प्रदोष व्रत, कालाष्टमी, शिवरात्रि और अमावस्या जैसे कई महत्वपूर्ण दिन शामिल हैं। यह पूरा माह भक्ति, साधना और आत्मिक शुद्धि के लिए समर्पित माना जाता है, इसलिए कई श्रद्धालु इस दौरान विशेष पूजा-पाठ और संयमित जीवनशैली अपनाते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास को भगवान विष्णु का प्रिय महीना माना गया है, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस दौरान किए गए दान, जप और व्रत का फल कई गुना अधिक माना जाता है। लोग इस समय ध्यान, भजन और पूजा में अधिक समय व्यतीत करते हैं और अपने जीवन में सकारात्मकता लाने का प्रयास करते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो अधिकमास कैलेंडर की त्रुटियों को सुधारने का एक प्राकृतिक तरीका है, जो समय और ऋतुओं के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। यही कारण है कि यह महीना हर तीन वर्षों के आसपास एक बार आता है और इसे हिंदू पंचांग की एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था माना जाता है।
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