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सड़क हादसे के बाद दर्द से तड़प रहा आदिवासी परिवार… 25 दिन बीतने के बाद भी दर्ज नहीं हुई एफआईआर

May 26, 2026

  • सुखसागर अस्पताल के रवैए और बरगी पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल

जबलपुर। सड़क हादसों में घायल लोगों को समय पर इलाज और न्याय दिलाने का दावा करने वाली व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार मामला बरगी थाना क्षेत्र का है, जहां एक गरीब आदिवासी परिवार बीते 25 दिनों से न्याय और इलाज के लिए दर-दर भटक रहा है। आरोप है कि सुख सागर मेडिकल हॉस्पिटल और बरगी पुलिस की मिलीभगत के चलते पूरे मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है, ताकि इंश्योरेंस और जिम्मेदारी से जुड़े सवालों को ठंडे बस्ते में डाला जा सके। जानकारी के अनुसार ऐंठाखेड़ा रामपुर नकटिया निवासी चंदर सिंह सैयाम और उनके बेटे कमलेश सैयाम का करीब 25 दिन पहले एक तेज रफ्तार कार से गंभीर एक्सीडेंट हो गया था। हादसे के बाद दोनों को इलाज के लिए सुख सागर मेडिकल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल ने शुरुआती इलाज के बाद जल्दबाजी में दोनों को यह कहकर डिस्चार्ज कर दिया कि उनकी हालत सामान्य है, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग थी।



  • परिवार का कहना है कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी दोनों की हालत लगातार बिगड़ती गई। चंदर सिंह और उनका बेटा कमलेश आज भी गंभीर दर्द से कराह रहे हैं। शरीर में चोटों का दर्द इतना अधिक है कि वे ठीक से चल-फिर तक नहीं पा रहे। आर्थिक रूप से कमजोर यह आदिवासी परिवार अब इलाज कराने में भी असमर्थ नजर आ रहा है। घर की हालत ऐसी है कि दवाइयों के लिए भी लोगों से उधार लेना पड़ रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हादसे को 25 दिन बीत जाने के बाद भी बरगी पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं कर पाई है। परिजनों का आरोप है कि पुलिस जानबूझकर मामले को लटकाए हुए है। परिवार कई बार थाने के चक्कर लगा चुका है, लेकिन हर बार उन्हें जांच का हवाला देकर टाल दिया जाता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब सड़क हादसा हुआ, घायल अस्पताल पहुंचे और इलाज तक हुआ, तो आखिर एफआईआर दर्ज करने में इतनी देरी क्यों हो रही है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूरे मामले में इंश्योरेंस क्लेम और जिम्मेदारी तय होने से बचाने के लिए खेल किया जा रहा है। यदि समय पर मामला दर्ज हो जाता तो घायल परिवार को कानूनी सहायता और बीमा का लाभ मिल सकता था। लेकिन अब तक की कार्रवाई ने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गांव के लोगों में भी इस घटना को लेकर भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि यदि यही हादसा किसी रसूखदार व्यक्ति के साथ हुआ होता तो पुलिस और अस्पताल दोनों तुरंत सक्रिय हो जाते, लेकिन गरीब आदिवासी परिवार होने के कारण उनकी सुनवाई नहीं हो रही।

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