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करियर, व्यापार और मानसिक शांति के लिए खास मानी जाती है निर्जला एकादशी, जानिए नियम

June 04, 2026

नई दिल्ली । सनातन धर्म (Sanatan Dharma) में एकादशी तिथि (Ekadashi Tithi) का विशेष महत्व माना गया है, लेकिन वर्षभर आने वाली सभी एकादशियों में निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) को सबसे महत्वपूर्ण और कठिन व्रतों में शामिल किया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन व्रत 25 जून को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं (Religious Beliefs) के अनुसार इस दिन श्रद्धालु बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की आराधना करते हैं। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए इस व्रत से चौबीस एकादशियों के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। यही कारण है कि देशभर में लाखों श्रद्धालु इस तिथि का विशेष इंतजार करते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार निर्जला एकादशी का संबंध महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि पांडवों में भीमसेन अन्य भाइयों की तरह नियमित रूप से एकादशी व्रत नहीं रख पाते थे। उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा जिससे उन्हें सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो सके। तब उन्हें निर्जला एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी गई। कहा जाता है कि भीमसेन ने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत किया और तभी से इस एकादशी का महत्व और अधिक बढ़ गया।

धार्मिक दृष्टि से यह दिन भगवान विष्णु की उपासना और आत्मसंयम का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं, मंत्र जाप करते हैं तथा दान-पुण्य के कार्यों में भाग लेते हैं। अनेक लोग इस दिन जरूरतमंदों को जल, फल, वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान भी करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी मानसिक संतुलन, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ाने का अवसर भी मानी जाती है। इस दिन पीपल वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु का स्मरण, मंत्र जाप और ध्यान करना शुभ माना जाता है। कई लोग घर और पूजा स्थल में गंगाजल का छिड़काव करते हैं ताकि वातावरण में सकारात्मकता बनी रहे। आर्थिक उन्नति और समृद्धि की कामना से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा भी की जाती है।

विद्यार्थियों के लिए भी यह दिन विशेष माना जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार अध्ययन सामग्री की पूजा, धार्मिक ग्रंथों का पाठ और ध्यान जैसी गतिविधियां एकाग्रता बढ़ाने में सहायक मानी जाती हैं। वहीं परिवार के सदस्यों के साथ धार्मिक कथा, भजन या आध्यात्मिक चर्चा करने से पारिवारिक सौहार्द और आपसी संवाद मजबूत होने की मान्यता है।


  • निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं है, बल्कि आत्मनियंत्रण और सकारात्मक सोच को जीवन में अपनाने का संदेश भी देती है। धार्मिक परंपराओं में यह माना गया है कि इस दिन क्रोध, असत्य, कटु वचन और नकारात्मक व्यवहार से दूर रहना चाहिए। श्रद्धालुओं को संयम, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाती है। इसी भावना के साथ मनाया गया यह व्रत व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाने और जीवन में संतुलन स्थापित करने का माध्यम माना जाता है।

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