लंदन/जिनेवा। दुनिया तेजी से गहराते जलवायु संकट (The Climate Crisis) की ओर बढ़ रही है। हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों में चेतावनी दी गई है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों (Greenhouse Gases) का उत्सर्जन मौजूदा रफ्तार से जारी रहा, तो वर्ष 2030 तक वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की अहम सीमा को पार कर सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर समुद्र, खेती, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, अर्थव्यवस्था और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पृथ्वी पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रही है और इसके पीछे मानवजनित गतिविधियां प्रमुख वजह हैं। जीवाश्म ईंधन का बढ़ता इस्तेमाल, औद्योगिक कार्बन उत्सर्जन और बड़े पैमाने पर वनों की कटाई ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
Earth System Science Data में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2025 में पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में करीब 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान में यह अतिरिक्त वृद्धि पूरी तरह मानव गतिविधियों से जुड़ी हुई है। साथ ही पिछले कुछ वर्षों में तापमान बढ़ने की गति पहले के दशकों की तुलना में तेज हुई है।
इसी कारण अब 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने की आशंका पहले से अधिक मजबूत मानी जा रही है। वर्ष 2015 में हुए Paris Agreement के तहत दुनिया के देशों ने तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और संभव हो तो 1.5 डिग्री तक सीमित करने का लक्ष्य तय किया था, ताकि जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर प्रभावों को रोका जा सके।
अध्ययन में बताया गया है कि 1901 के बाद से वैश्विक समुद्र स्तर लगभग 23 सेंटीमीटर बढ़ चुका है। इससे तटीय इलाकों पर खतरा लगातार बढ़ रहा है। समुद्र के तापमान में वृद्धि के कारण समुद्री लू (Marine Heatwaves) की घटनाएं भी तेजी से बढ़ी हैं, जिसका असर प्रवाल भित्तियों, मछलियों और समुद्री जैव विविधता पर साफ दिखाई दे रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार 1991 की तुलना में समुद्री लू वाले दिनों की संख्या तीन गुना से अधिक हो चुकी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती गर्मी, समुद्र स्तर में वृद्धि और चरम मौसम की घटनाएं अब दुनिया के लगभग हर हिस्से में महसूस की जा रही हैं। हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि अभी भी हालात को और बिगड़ने से रोका जा सकता है, लेकिन इसके लिए देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेज कटौती, जलवायु निगरानी तंत्र को मजबूत करने और स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ने की जरूरत होगी।
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