मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में दशकों तक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति रही शिवसेना (Shiv Sena) एक बार फिर आंतरिक संकट से जूझ रही है। पार्टी संस्थापक बालासाहेब ठाकरे (Balasaheb Thackeray) के दौर से लेकर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व तक संगठन कई बार टूट का सामना कर चुका है। अब शिवसेना (UBT) के छह सांसदों की बगावत ने एक बार फिर पार्टी नेतृत्व और ठाकरे ब्रांड की राजनीतिक पकड़ पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
1966 में स्थापित शिवसेना ने बालासाहेब ठाकरे के नेतृत्व में महाराष्ट्र की राजनीति में मजबूत पहचान बनाई। हालांकि पार्टी में पहला बड़ा विद्रोह 1991 में देखने को मिला, जब छगन भुजबल ने 17 विधायकों के साथ पार्टी छोड़ दी थी। भुजबल ने उस समय नेतृत्व शैली और संगठन में उपेक्षा का आरोप लगाया था। बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया।
2003 में उद्धव ठाकरे को शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी में असंतोष के कई दौर सामने आए।
2005: पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने उद्धव को उत्तराधिकारी बनाए जाने का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गए।
2006: ठाकरे परिवार के भीतर ही सबसे चर्चित राजनीतिक विभाजन हुआ, जब राज ठाकरे ने अलग होकर मनसे की स्थापना की।
2022: पार्टी को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब एकनाथ शिंदे 40 विधायकों के साथ अलग हो गए। इस घटनाक्रम के बाद उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और पार्टी का मूल नाम तथा चुनाव चिन्ह भी उनके हाथ से निकल गया।
2022 की बगावत के बाद शिवसेना (यूबीटी) का राजनीतिक आधार कमजोर होता दिखाई दिया। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन सीमित रहा। वहीं मुंबई की सत्ता का केंद्र मानी जाने वाली Brihanmumbai Municipal Corporation में भी पार्टी का लंबे समय से चला आ रहा प्रभाव कमजोर पड़ गया।
अब एकनाथ शिंदे की बगावत के कुछ वर्षों के भीतर ही शिवसेना (यूबीटी) के नौ सांसदों में से छह सांसदों के अलग होने की खबरों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार हो रहे विभाजन से संगठनात्मक एकजुटता और ठाकरे परिवार की नेतृत्व क्षमता दोनों पर दबाव बढ़ रहा है।
पार्टी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने बचे हुए जनाधार को मजबूत बनाए रखने और आगामी राजनीतिक लड़ाइयों के लिए संगठन को फिर से खड़ा करने की है। लगातार हो रहे विद्रोहों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिवसेना के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक संतुलन का मुद्दा अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है।
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