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बैंक ने रोके FD के 5 लाख, HC का आदेश- 12% ब्याज समेत लौटाएं पूरा पैसा

June 28, 2026

नई दिल्ली: आम आदमी अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई इस भरोसे के साथ बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करता है कि जरूरत पड़ने पर वह पैसा उसके काम आएगा. लेकिन क्या हो जब मैच्योरिटी पूरी होने के बाद भी बैंक आपको आपके ही पैसे लौटाने से मना कर दे? केरल में एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया है. त्रिशूर के रहने वाले एक शख्स की 5 लाख रुपये की एफडी 2015 में मैच्योर हो गई थी, लेकिन बैंक ने तकनीकी खामियों का हवाला देकर पैसे देने से इनकार कर दिया. अब 11 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, केरल हाईकोर्ट की एक बड़ी बेंच ने 2 जून 2026 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. कोर्ट ने बैंक को आदेश दिया है कि वह ग्राहक को 12 प्रतिशत ब्याज और 10 हजार रुपये के मुआवजे के साथ एफडी की पूरी रकम लौटाए. यह फैसला देश भर के करोड़ों बैंक ग्राहकों के अधिकारों को मजबूती देने वाला है.

यह पूरा विवाद त्रिशूर के मुल्लमकुन्नथ कावू इलाके में रहने वाले सेतुमाधवन से जुड़ा है. उन्होंने एक को-ऑपरेटिव बैंक में 5 लाख रुपये की एफडी कराई थी, जिसकी मैच्योरिटी 2 जून 2015 को तय थी. जब तय तारीख पर सेतुमाधवन अपना पैसा निकालने पहुंचे, तो बैंक प्रबंधन ने तकनीकी कारणों का बहाना बनाकर रकम लौटाने से पल्ला झाड़ लिया. अपने ही पैसों के लिए दर-दर भटकने के बाद, उन्होंने त्रिशूर के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का दरवाजा खटखटाया. आयोग ने सबूतों को देखते हुए 31 दिसंबर 2021 को ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया और बैंक को 12 प्रतिशत ब्याज व 10 हजार रुपये जुर्माने के साथ 5 लाख रुपये चुकाने का निर्देश दिया.


  • उपभोक्ता आयोग के स्पष्ट आदेश के बावजूद बैंक ने पैसे नहीं लौटाए. इसके उलट, पूरे 825 दिनों की भारी देरी के बाद बैंक ने केरल हाईकोर्ट का रुख किया. बैंक की दलील थी कि 10 दिसंबर 2014 से 7 मई 2022 तक उनका प्रबंधन एक प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) के हाथों में था, जिसके कारण अपील करने में इतना वक्त लग गया. हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने बैंक के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया और आयोग का फैसला बरकरार रखा. लेकिन बैंक प्रबंधन यहीं नहीं रुका. उसने फैसले को चुनौती देते हुए बड़ी बेंच में अपील कर दी और इस बार एक नया कानूनी दांव खेला.

    बड़ी बेंच के सामने बैंक ने तर्क दिया कि चूंकि वे एक सहकारी (को-ऑपरेटिव) बैंक हैं, इसलिए उन पर केरल को-ऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट, 1969 की धारा 69 लागू होती है. बैंक का कहना था कि इस कानून के तहत सिंगल बेंच या कंज्यूमर फोरम को इस मामले की सुनवाई का अधिकार ही नहीं है. हालांकि, 2 जून 2026 को हाईकोर्ट की बड़ी बेंच ने बैंक की इन सभी दलीलों को हवा कर दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट) संसद द्वारा विशेष रूप से ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है. ऐसे में, यह विशेष कानून सहकारी समिति अधिनियम के प्रावधानों से हमेशा ऊपर माना जाएगा.

    केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक बेहद अहम बात कही जो हर आम नागरिक से जुड़ी है. कोर्ट ने कहा कि पब्लिक फंड के साथ काम करने वाले किसी भी बैंकिंग संस्थान की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह अपने जमाकर्ताओं को उनका पैसा समय पर लौटाए. अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब 2015 में एफडी की मैच्योरिटी को लेकर कोई विवाद ही नहीं है, तो महज तकनीकी खामियों का बहाना बनाकर ग्राहकों का पैसा रोकना बेहद निंदनीय है. कोर्ट ने बैंक के वकील की अपील पर रकम लौटाने के लिए 6 महीने का अतिरिक्त समय दिया और उनकी याचिका खारिज कर दी.

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