
उज्जैन। शहर में शराबबंदी के बावजूद कालभैरव मंदिर के आसपास अवैध रूप से शराब बेची जा रही है तथा यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को बताया जाता है कि शराब यहाँ का प्रसाद है तथा पुरुषों के साथ महिलाएँ भी पी रही हैं। प्रशासन को चाहिए कि कालभैरव मंदिर में केवल एक बार सुबह के समय परम्परानुसार मंदिर समिति की ओर से शराब का भोग लगा दिया जाए और किसी श्रद्धालु से शराब नहीं चढ़वाई जाए। आए दिन यहाँ पर विवाद भी हो रहे हैं तथा आसपास के इलाके में शराब भी बेची जा रही है।
प्रदेश सरकार द्वारा उज्जैन में शराबबंदी लागू किए जाने के लगभग डेढ़ वर्ष बाद भी भगवान कालभैरव मंदिर के आसपास शराब की अवैध बिक्री पर पूरी तरह रोक नहीं लग सकी है। मंदिर क्षेत्र में दुकानों और अन्य लोगों द्वारा चोरी-छिपे शराब बेची जा रही है। सबसे गंभीर बात यह है कि इसे भगवान कालभैरव का प्रसाद बताकर श्रद्धालुओं को दिया जा रहा है, जिसके कारण पुरुषों के साथ-साथ बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु भी आस्था के नाम पर शराब का सेवन कर रही हैं। कालभैरव मंदिर में भगवान को मदिरा का भोग लगाने की प्राचीन परंपरा रही है, लेकिन इसी परंपरा की आड़ में कुछ लोग अवैध कारोबार चला रहे हैं। मंदिर के बाहर शराब बेचने वाले श्रद्धालुओं को यह कहकर शराब खरीदने के लिए प्रेरित करते हैं कि यही कालभैरव का प्रसाद है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु परंपरा की पूरी जानकारी नहीं होने के कारण उनकी बातों में आ जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर के आसपास आए दिन शराब पीने को लेकर विवाद और झगड़े भी होते हैं। इससे न केवल मंदिर की गरिमा प्रभावित हो रही है, बल्कि धार्मिक वातावरण भी खराब हो रहा है। शराबबंदी लागू होने के बावजूद मंदिर क्षेत्र में अवैध शराब की उपलब्धता प्रशासन की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े करती है। धार्मिक जानकारों का मानना है कि भगवान कालभैरव को मदिरा अर्पित करने की परंपरा मंदिर की धार्मिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए शराब पीना अनिवार्य नहीं है। इसके बावजूद कुछ लोग इसे प्रसाद बताकर श्रद्धालुओं को भ्रमित कर रहे हैं।
सिर्फ मंदिर समिति लगाए भोग, श्रद्धालुओं से न चढ़वाई जाए शराब….
शहर के लोगों का कहना है कि इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। उनका सुझाव है कि प्रतिदिन सुबह मंदिर समिति द्वारा परंपरा के अनुसार भगवान कालभैरव को एक बार मदिरा का भोग लगा दिया जाए, लेकिन किसी भी श्रद्धालु से शराब चढ़वाने या खरीदवाने की अनुमति नहीं हो। इससे परंपरा भी बनी रहेगी और आस्था की आड़ में चल रहे अवैध कारोबार पर भी रोक लग सकेगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन, आबकारी विभाग और मंदिर प्रबंधन इस गंभीर मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं। यदि समय रहते सख्ती नहीं की गई तो धार्मिक आस्था के नाम पर चल रहा यह खेल आगे भी श्रद्धालुओं को गुमराह करता रहेगा।
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