
44 लाख की स्टाम्प ड्यूटी वसूली मामले में कलेक्टर की भी हो चुकी है लोकायुक्त के समक्ष पेशी
पुलिस-प्रशासन के साथ सहकारिता विभाग में भी ताजा विवाद के बाद दस्तावेजों की जांच शुरू, रजिस्ट्री, नोटरी और एग्रीमेंट की जानकारी मांगी
इंदौर। पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में आई डायमंड गृह निर्माण संस्था (Diamond Grih Nirman Sanstha) को लेकर यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि उक्त संस्था वर्षों पहले ही परिसमापन में ली जा चुकी है और फिलहाल संस्था का अस्तित्व नहीं है। जबकि हकीकत में सहकारिता विभाग (Cooperation Department) ने अभी तक इस संस्था के परिसमापन की प्रक्रिया पूरी नहीं की है और पंजीयन (Registration) भी निरस्त नहीं किया है। यानी फिलहाल संस्था जिंदा है और उसका पंजीयन भी यथावत है और प्रशासक की भी नियुक्ति है, वहीं पुलिस महकमा जहां इस भू-घोटाले से जुड़े दीपक जैन उर्फ मद्दा से पूछताछ कर रहा है वहीं संघवी सेे दस्तावेजों और एग्रीमेंट की जानकारी भी मांगी गई है। दूसरी तरफ प्रशासन और सहकारिता विभाग ने भी इस संस्था से जुड़े दस्तावेजों-तथ्यों की जांच-पड़ताल नए सिरे से शुरू करवाई है।
इस संस्था डायमंड गृह निर्माण के मामले में एक और हकीकत यह है कि सीलिंग की कार्रवाई से बचने के लिए जहां गृह निर्माण संस्था बनाई गई, वहीं उस वक्त इस तरह की संस्थाओं को स्टाम्प ड्यूटी में शासन ने छूट भी दे रखी थी, जो बाद में दुरुपयोग के चलते समाप्त कर दी गई। डायमंड गृह निर्माण संस्था के कर्ताधर्ताओं ने शासन की स्टाम्प ड्यूटी की छूट का भी लाभ लिया और लाखों रुपए की स्टाम्प ड्यूटी चोरी कर शासन के पंजीयन विभाग को राजस्व का चूना भी लगाया। सूत्रों के मुताबिक, डायमंड गृह निर्माण पर लगभग 44 लाख रुपए की स्टाम्प ड्यूटी वसूली का मामला बना और लोकायुक्त में भी इसकी शिकायत हुई, जिसके चलते तत्कालीन इंदौर कलेक्टर आकाश त्रिपाठी को भोपाल स्थित लोकायुक्त कार्यालय में पेश भी होना पड़ा था। 44 लाख रुपए की स्टाम्प ड्यूटी वर्ष 2003 में जमीन बेचने के दौरान संस्था ने जो हासिल की और बाद में जमीनों की अफरा-तफरी कर दी गई, उसके चलते पंजीयन विभाग ने यह वसूली निकाली थी। जमीन मालिकों ने जमीन की बिक्री को गलत बताकर कोर्ट में चुनौती दी और 2008 में अन्य कम्पनी को जमीन बेची और शून्य घोषित की गई रजिस्ट्री पर स्टाम्प ड्यूटी वसूली का प्रकरण चलता रहा। दूसरी तरफ कनाडिय़ा रोड से लगी इस जमीन का वर्षों पहले संघवी ने सौदा किया। साथ में दीपक जैन मद्दा जुड़ा। कुछ वर्ष पूर्व जमीन खाली कराने का ठेका 6 करोड़ में बब्बू-छब्बू को भी दिया गया और उसी तरह अभी फिर जमीन खाली कराने में गुंडों का सहारा और राजनीतिक संरक्षण लेने का मामला उजागर हुआ, जिसके चलते पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह की सख्ती के बाद कनाडिय़ा थाने ने एफआईआर दर्ज करते हुए चार आरोपियों को गिरफ्तार किया और उनसे हुई पूछताछ के आधार पर पहले प्रतीक संघवी से जहां दस्तावेजों की जानकारी ली, वहीं दीपक मद्दा को थाने बुलाकर घंटों पूछताछ की गई। बताया जाता है कि उक्त भूमि को लेकर खंडेलवाल से एक डवलपमेंट अनुबंध सयंम कंस्ट्रक्शन ने किया था, जिसमें कंपनी ने भूमि खाली कराने से लेकर उसके डवलपमेंट का काम खंडेलवाल को सौंपा था और खंडेलवाल ने ही उक्त भूमि को खाली कराने के लिए गुंडे भेजे थे। पुलिस को यह दस्तावेज प्राप्त हो चुके हैं। दस्तावेजों के अनुसार उक्त जमीन पहले हाजी एंड कम्पनी के पास थी। उसके बाद इसे डायमंड गृह निर्माण संस्था में ट्रांसफर किया और उसके बाद संयंम इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा.लि. ने इसे खरीदा, जिसमें संघवी और मद्दा डायरेक्टर रहे इस कंपनी को लगभग 7 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई। पूर्व में कम्पनी और बाद में संस्था ने भी कई लोगों को छोटे-छोटे प्लॉट काटकर रजिस्ट्री करा दी और कई नोटरियां भी निष्पादित हुई। अब इन्हीं सदस्यों की जमीनें खाली कराई जा रही है। उधर, सहकारिता विभाग का कहना है कि 2003 में संस्था को परिसमापन में लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। मगर बाद में पता चला कि इस संस्था के खिलाफ जांच चल रही है और प्रशासन-पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की है और लोकायुक्त में भी प्रकरण चल रहा है, जिसके चलते संस्था का परिसमापन नहीं हो सका और प्रशासक की नियुक्ति की गई। वर्तमान में भी संस्था के प्रशासक सहकारिता निरीक्षण संजय कुचनकर हैं। उनका भी कहना है कि संस्था का पंजीयन फिलहाल यथावत है और संस्था का परिसमापन फिलहाल नहीं हुआ है। अभी 160 से अधिक जिन संस्थाओं को परिसमापन में लिया गया है उस सूची में यह संस्था डायमंड गृह निर्माण संस्था भी शामिल है।
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