
नई दिल्ली । सनातन धर्म में एकादशी (Ekadashi) तिथि को भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की आराधना और व्रत-उपवास के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। आषाढ़ मास (Ashadha Month) के कृष्ण पक्ष में आने वाली योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से पापों का क्षय होता है तथा जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस वर्ष योगिनी एकादशी की तिथि दो दिनों तक रहने के कारण श्रद्धालुओं के बीच व्रत की सही तारीख को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
वैदिक पंचांग के अनुसार आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 10 मिनट से प्रारंभ होकर 11 जुलाई 2026, शनिवार को सुबह 5 बजकर 23 मिनट तक रहेगी। इसके बाद द्वादशी तिथि का आरंभ हो जाएगा। तिथि के दो दिनों तक रहने के कारण कई श्रद्धालु यह जानना चाहते हैं कि व्रत किस दिन करना अधिक शुभ और शास्त्रसम्मत रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष एकादशी तिथि का विशेष संयोग बन रहा है। 11 जुलाई को सूर्योदय से पहले ही एकादशी समाप्त होकर द्वादशी आरंभ हो जाएगी। ऐसी स्थिति को शास्त्रों में एकादशी क्षय की स्थिति माना जाता है। परंपरागत नियमों के अनुसार जब सूर्योदय के समय एकादशी तिथि उपलब्ध न हो, तब गृहस्थों के लिए पहले दिन व्रत रखना श्रेष्ठ माना जाता है। इसी आधार पर गृहस्थ श्रद्धालुओं के लिए 10 जुलाई, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी जाती है। वहीं वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु 11 जुलाई को भी व्रत रख सकते हैं।
योगिनी एकादशी व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही प्रारंभ मानी जाती है। इस दिन सात्विक भोजन करने और तामसिक आहार से दूर रहने का विधान बताया गया है। व्रत के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र धारण करना और भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लेना शुभ माना जाता है। इसके बाद पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा की जाती है।
पूजन के दौरान भगवान विष्णु को तुलसी दल, पीले पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। साथ ही ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने की भी धार्मिक मान्यता है। दिनभर संयम, सात्विकता और भगवान विष्णु के स्मरण के साथ व्रत का पालन करने की परंपरा है। व्रत का समापन अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण करके किया जाता है।
धार्मिक नियमों के अनुसार एकादशी और द्वादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित माना गया है। इसलिए पूजा के लिए आवश्यक तुलसी दल एक दिन पहले ही एकत्र कर लेना उचित माना जाता है। इसके अलावा व्रत के दिन चावल का सेवन नहीं किया जाता और यथासंभव परिवार के अन्य सदस्य भी इस नियम का पालन करते हैं। इन परंपराओं को व्रत की पवित्रता और धार्मिक मर्यादा से जोड़कर देखा जाता है।
योगिनी एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सदाचार, भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और दान-पुण्य का संदेश देने वाला पावन अवसर माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ किया गया यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए इस दिन पूजा-व्रत के साथ जरूरतमंदों की सहायता और दान-पुण्य को भी विशेष महत्व दिया गया है।
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