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क्या व्हेल मछलियों की भी होती है अपनी संस्कृति? 20 हजार वर्षों में कैसे बदली स्पर्म व्हेल की ‘बोली’, रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

July 10, 2026

नई दिल्ली। क्या केवल इंसानों की ही अपनी भाषा, बोली और संस्कृति होती है? वैज्ञानिकों (Scientist) की एक नई रिसर्च इस धारणा को चुनौती देती है। अध्ययन में पता चला है कि स्पर्म व्हेल (Sperm Whale) भी अलग-अलग क्षेत्रों में रहने के कारण अपनी अलग “बोलियां” विकसित कर चुकी हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन समुद्री जीवों के संचार का तरीका समय के साथ बदलता रहा है, ठीक वैसे ही जैसे इंसानी भाषाएं और बोलियां विकसित होती हैं।

यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका Proceedings of the Royal Society B में प्रकाशित हुआ है, जिसमें भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में रहने वाली स्पर्म व्हेलों के लगभग दो दशकों के व्यवहार और ध्वनियों का विश्लेषण किया गया।


  • क्लिक की आवाज से करती हैं बातचीत

    स्पर्म व्हेल आपस में संवाद करने के लिए लगातार क्लिक जैसी ध्वनियां निकालती हैं। वैज्ञानिक इन ध्वनि पैटर्न को ‘कोडा’ (Coda) कहते हैं। यह कई क्लिकों का एक निश्चित क्रम होता है, जिससे व्हेल एक-दूसरे तक संदेश पहुंचाती हैं।

    शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने करीब 20 वर्षों में एकत्र की गई 5,291 कोडा रिकॉर्डिंग्स का विश्लेषण किया। इससे पता चला कि अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाली व्हेल एक ही प्रकार के संदेश को अलग-अलग गति और लय में व्यक्त करती हैं।

    पूर्वी और पश्चिमी भूमध्य सागर की व्हेलों में अंतर

    पहले माना जाता था कि भूमध्य सागर की सभी स्पर्म व्हेल लगभग एक जैसी संचार प्रणाली अपनाती हैं। लेकिन नए अध्ययन में पाया गया कि ग्रीस के आसपास रहने वाली पूर्वी व्हेल वही ध्वनि क्रम पश्चिमी भूमध्य सागर, विशेषकर स्पेन के पास रहने वाली व्हेलों की तुलना में कहीं अधिक तेज गति से दोहराती हैं।

    शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अंतर समय के साथ विकसित हुई क्षेत्रीय बोली (Regional Dialect) का संकेत हो सकता है।

    पुरानी ‘बोली’ भी नहीं भूलीं

    अध्ययन की एक रोचक खोज यह भी रही कि पूर्वी क्षेत्र की व्हेलें नई तेज शैली अपनाने के बावजूद कभी-कभी पुरानी धीमी शैली का भी उपयोग करती हैं। वैज्ञानिक इसकी तुलना उन लोगों से करते हैं जो नई भाषा सीखने के बाद भी अपनी मातृभाषा बोलना नहीं भूलते।

    20 हजार वर्षों का विकास

    शोधकर्ताओं के अनुसार, स्पर्म व्हेलों का यह समूह लगभग 20,000 वर्ष पहले जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के रास्ते भूमध्य सागर में पहुंचा था। इसके बाद अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में बसने के कारण इनके समूह एक-दूसरे से भौगोलिक रूप से अलग हो गए। लंबे समय में इसी अलगाव ने इनके संचार के तरीके में बदलाव पैदा किया और नई क्षेत्रीय बोलियों का विकास हुआ।

    इंसानी संस्कृति को समझने में भी मदद

    वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध केवल समुद्री जीवों के व्यवहार तक सीमित नहीं है। इससे यह समझने में भी मदद मिल सकती है कि सामाजिक समूहों में भाषा और संस्कृति समय के साथ कैसे विकसित होती है। यह अध्ययन इस बात के भी संकेत देता है कि जटिल सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक परंपराएं केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कुछ अन्य बुद्धिमान प्रजातियों में भी विकसित हो सकती हैं।

    संरक्षण की भी चुनौती

    विशेषज्ञों के अनुसार, भूमध्य सागर में स्पर्म व्हेल की आबादी सीमित रह गई है और यह प्रजाति कई क्षेत्रों में संरक्षण की चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे में इनके व्यवहार, संचार और सामाजिक संरचना को समझना भविष्य की संरक्षण योजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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