
नई दिल्ली। अमेरिका (America) के सांसदों के द्विलीय समूह ने एक नया प्रतिबंध बिल पेश किया है। इस बिल में रूस (Russia) से कच्चा तेल खरीदने (Buying Crude Oil) के लिए भारत पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। इस बिल में 5 प्रमुख देशों- भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान के निर्यात पर 100% तक का टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका मुख्य मकसद रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई पर लगाम लगाना और यूक्रेन युद्ध को खत्म करने का दबाव बनाना है।
क्या हैं इस नए बिल की मुख्य बातें
यह बिल अप्रैल 2025 में सीनेट में लाए गए ‘सेंक्शनिंग रशिया एक्ट’ का एक नरम वर्जन है। पुराने बिल में 500% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, जिस पर सहमति नहीं बन पाई थी। नए बिल में इस अधिकतम टैरिफ की सीमा को घटाकर 100% तक सीमित किया गया है।
नए बिल के तहत खास तौर पर चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान को टारगेट किया गया है, जो इस वक्त रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बिल को अपना समर्थन दिया है। रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम (जिनका हाल ही में निधन हो गया) ने इस बिल की रूपरेखा तैयार की थी। ट्रंप ने कहा है कि यह बिल ग्राहम के सम्मान में लाया गया है। उन देशों को इस बिल के दायरे से बाहर रखा गया है जो रूस से अपनी कुल प्राकृतिक गैस की जरूरत का 15% से कम आयात करते हैं और इस निर्भरता को कम करने के लिए सक्रिय कदम उठा रहे हैं।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
नए टैरिफ का यह खतरा ऐसे समय में सामने आया है जब भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में शिपिंग बाधित होने के कारण भारत को रूस का रुख करना पड़ा था। दरअसल, अमेरिका-इजरायल सैन्य हमलों के बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई के कारण खाड़ी देशों से आने वाले कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई। यह सप्लाई पहले भारत के कुल तेल आयात का लगभग 40% हिस्सा हुआ करती थी। इस संकट के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए वॉशिंगटन ने खुद प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी थी (जो 17 जून को समाप्त हो गई), जिसके कारण भारतीय रिफाइनरियों को मुख्य विकल्प के तौर पर रूसी कच्चे तेल की तरफ मुड़ना पड़ा।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 34% बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसका कुल मूल्य करीब 4.5 बिलियन यूरो था, जो रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात राजस्व का लगभग 36% है। चीन के बाद भारत रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया है।
अब आगे क्या होगा?
डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटल के मुताबिक, यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) यह तय करेंगे कि किस देश पर कितना टैरिफ लगाया जाए। उन्होंने कहा कि यह दर चीन, भारत और अन्य बड़े खरीदारों को हतोत्साहित करने के लिए उचित स्तर पर तय की जाएगी। बिल के समर्थकों को उम्मीद है कि अगस्त से पहले इसे सीनेट में पास करा लिया जाएगा। हालांकि, अमेरिकी संसद में कुछ सांसदों ने इस बिल की कड़ी आलोचना भी की है। उनका तर्क है कि यह राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का असीमित बैकडोर अधिकार देता है, जिसका नुकसान अंततः आम अमेरिकी परिवारों को ही उठाना पड़ेगा।
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