
जबलपुर। जिले में मूंग के सरकारी खरीदी केंद्रों पर सन्नाटा पसरा है और किसान वहां अपनी उपज बेचने से किनारा कर रहे हैं। इस बार मूंग बेचने वाले किसानों की संख्या में भारी कमी दर्ज की गई है क्योंकि सरकारी नियमों में किए गए बदलावों से किसानों को सीधा आर्थिक नुकसान हो रहा है। जबलपुर में 53 हजार एकड़ क्षेत्र में मूंग की बुवाई हुई है लेकिन सरकारी आंकड़ों और हकीकत में बड़ा अंतर सामने आया है। शासन ने 5.81 क्विंटल प्रति एकड़ की उत्पादकता तय की है जबकि वास्तविक औसत उत्पादन 8 क्विंटल प्रति एकड़ होता है। प्रशासन द्वारा केवल 25 प्रतिशत यानी 1.45 से 1.48 क्विंटल प्रति एकड़ ही समर्थन मूल्य पर खरीदने के निर्णय से किसान नाराज हैं और अब नियमों में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
पंजीयन कराने वाले किसानों की संख्या घटी
मूंग के पंजीयन की प्रक्रिया 15 जून 2026 को समाप्त हुई थी। जबलपुर में इस साल केवल 8,500 किसानों ने ही पंजीयन कराया है जो पिछले साल की तुलना में आधा है। किसानों का आरोप है कि समय पर गिरदावरी न होने के कारण हजारों किसान पंजीयन करवाने से वंचित रह गए हैं। हालांकि मूंग खरीदी 1 जुलाई 2026 से शुरू हो चुकी है और इसके लिए 10 केंद्र बनाए गए हैं लेकिन वहां सन्नाटा है। उप संचालक कृषि उमेश कठरे ने बताया कि विभाग को प्रतिदिन मूंग विक्रय की जानकारी मिल रही है लेकिन अभी तक केवल इक्का-दुक्का किसान ही अपनी उपज लेकर केंद्रों तक पहुंच पाए हैं।
व्यवस्था में बदलाव की मांग तेज होती जा रही है
किसान अब शासन से यह मांग कर रहे हैं कि वे अपनी नीतियों में सुधार करें ताकि वास्तविक उत्पादक को लाभ मिल सके। उनका कहना है कि अगर सरकार 100 प्रतिशत उपज खरीदने का नियम लागू करती है तभी किसानों को लाभ होगा। वर्तमान में 25 प्रतिशत वाली सीमा ने उनकी कमर तोड़ दी है। जबलपुर के किसान एकजुट होकर अपनी बात रख रहे हैं और प्रशासन पर नियमों को सरल बनाने का दबाव बना रहे हैं। यदि समय रहते इन नियमों में संशोधन नहीं किया गया तो सरकारी खरीद का लक्ष्य पूरा होना मुश्किल होगा। अब देखना यह है कि क्या शासन किसानों की इस पीड़ा को समझकर कोई बड़ा फैसला लेता है या फिर किसान इसी तरह नुकसान झेलते रहेंगे।
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