काठमांडू। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (Balendra Shah) ने पदभार संभालने के बाद अपनाई गई अपनी कूटनीतिक नीति में बड़ा बदलाव किया है। शुरुआती 100 दिनों तक विदेशी राजदूतों से व्यक्तिगत मुलाकात से दूरी बनाए रखने वाले शाह अब इस सप्ताह भारत और चीन के राजदूतों से अलग-अलग बैठक करेंगे। इसे नेपाल की विदेश नीति के लिहाज से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय के समन्वय से प्रस्तावित इन बैठकों में प्रधानमंत्री शाह भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीनी राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात करेंगे। दोनों बैठकों को एक ही दिन आयोजित करने की तैयारी है। माना जा रहा है कि इसके जरिए नेपाल यह संदेश देना चाहता है कि उसके लिए भारत और चीन दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार हैं।
27 मार्च को प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद बालेन्द्र शाह ने विदेशी राजदूतों से व्यक्तिगत मुलाकात की परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया था। इसके बजाय उन्होंने 9 अप्रैल और 26 मई को सभी विदेशी राजदूतों के साथ संयुक्त बैठकें की थीं। उस समय इस कदम को नेपाल के कई कूटनीतिक विशेषज्ञों ने अधिक पारदर्शी और संतुलित व्यवस्था बताया था।
प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में शाह ने व्यापारिक संगठनों, उद्योगपतियों और अन्य घरेलू हितधारकों से व्यक्तिगत मुलाकातें शुरू की हैं। इसी क्रम में अब विदेशी राजनयिकों से भी अलग-अलग बातचीत का निर्णय लिया गया है। सूत्रों का कहना है कि नेपाल की विदेश नीति और क्षेत्रीय महत्व को देखते हुए भारत और चीन से इस नई प्रक्रिया की शुरुआत स्वाभाविक मानी गई।
इससे पहले प्रधानमंत्री शाह ने नेपाल आए कई वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों से व्यक्तिगत मुलाकात के अनुरोध स्वीकार नहीं किए थे। इनमें दक्षिण एवं मध्य एशियाई मामलों के सहायक विदेश मंत्री समीर पॉल कपूर, अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत सर्जियो गोर तथा अमेरिकी अंडर सेक्रेटरी (पब्लिक डिप्लोमेसी) सारा बी. रोजर्स शामिल थे। इन अधिकारियों को प्रधानमंत्री से मिलने का समय नहीं मिल पाया था।
प्रधानमंत्री बनने के बाद शाह ने व्यक्तिगत मुलाकात के अपने नियम में अब तक केवल एक अपवाद रखा था। उन्होंने जुलाई में नेपाल दौरे पर आए एशियाई विकास बैंक (ADB) के अध्यक्ष मासातो कांडा से औपचारिक मुलाकात की थी।
गौरतलब है कि नेपाल में परंपरा रही है कि नया प्रधानमंत्री पद संभालने के कुछ ही समय बाद विदेशी राजदूतों से व्यक्तिगत शिष्टाचार भेंट करता है। हालांकि, बालेन्द्र शाह ने शुरुआती 100 दिनों तक इस परंपरा से अलग राह अपनाई थी। अब भारत और चीन के राजदूतों से प्रस्तावित बैठक को उनकी कूटनीतिक रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
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