
एक युवक द्वारा वृद्धाश्रम के बूढ़ों को लाठियां मारने का वीडियो वायरल होते ही हरकत में आए प्रशासन ने वृद्धाश्रम को अवैध और पानी की टंकी के नीचे चलने वाला खतरनाक बताया… समाजसेवियों ने हल्ला मचाया… बूढ़ों की दुर्दशा पर लोगों ने आश्चर्य जताया, लेकिन कोई यह समझ नहीं पाया कि वह अवैध आश्रम नहीं होता तो लावारिस बूढ़े कहां जाते… क्या खाते… कहां रह पाते…न शासन को उनकी परवाह है… न सोशल मीडिया के चुहलबाज समाज को… न वो लाड़ली बहना की तरह खैरात पाते हैं…न वो मुफ्त का राशन पाते हैं…न उनका इलाज सरकारी अस्पतालों में हो पाता है और न ही उन्हें कोई वृद्ध पेंशन दिलाने जाता है, क्योंकि वो परिवार के ठुकराए हैं… समाज के लिए बीमार हैं… वोट नहीं डाल पाने के कारण नेताओं के लिए बेकार हैं… उन्हें संभालने… उनका जीवन बचाने… उनकी सेवा करने तो वो लोग भी नहीं जाते थे, जो कथाकारों को करोड़ों रुपए देकर कथा कराते हैं… जो कहानी बन चुकी कथाओं पर झूमते-गाते नजर आते हैं… जो धर्मावलंबी कहलाते हैं…जो धर्म के पुजारी माने जाते हैं…जो कृष्ण-सुदामा की कहानी पर मजमा जमाते हैं… जो गीता के चार-छह अध्याय सुन-सुनाकर अपने आपको कृष्ण मानने लग जाते हैं… जो करोड़ों खर्च कर कथा को कमाई बनाने वाले कुमार विश्वास को बुलाते हैं…प्रदीप मिश्रा को सुनने के लिए कतार लगाते हैं… बाबा बागेश्वर को भगवान मानते हैं, लेकिन इंसानियत को नहीं पहचानते हैं… और तो और जो समाजसेवी का तमगा लगाते हैं वो भी उन बूढ़ों का दर्द सुनने के लिए चंद समय नहीं निकाल पाते हैं… खुद को सम्पन्न, सज्जन और बलवान मानते हैं, लेकिन उन बूढ़ों को लावारिस छोड़ने वालों का कान तक नहीं पकड़ पाते हैं… उन्हें पुत्र की जिम्मेदारी समझाने नहीं जाते हैं… उन्हें कानून का पाठ नहीं पढ़ाते हैं… वे बेचारे बूढ़े जिंदगी की सजा भोगते हुए मौत का इंतजार कर रहे हैं और वैध-अवैध की चक्की में पिस रहे हैं… ऐसे कितने ही वृद्धाश्रम चल रहे हैं, जिन्हें चलाने वालों पर चंदाखोरी के इल्जाम लग रहे हैं, लेकिन यदि यह सच है तो एक सच यह भी है कि वो उन चंदाखोरों के यहां कम से कम पल तो रहे हैं… भोजन नहीं पा रहे हैं, लेकिन जो मिल रहा है वो खाकर भूख तो मिटा रहे हैं… प्रशासन ने अवैध आश्रम से बूढ़ों को निकालकर उन दूसरे आश्रमों में ठूंस दिया, जहां पहले से ही तादाद से ज्यादा बेघर वृद्ध रह रहे हैं… और अपनी बेबसी की कहानी कह रहे हैं…
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