
उज्जैन। 3 बड़े नाले का पानी शिप्रा में मिल रहा है, उज्जैन क्षेत्र के कुल 14 नालों में से 11 नालों को बंद करने का दावा किया गया है, लेकिन पीलियाखाल, हाटकेश्वर और भैरवगढ़ नाले आज भी बिना ट्रीटमेंट किया हुआ और जहरीला अपशिष्ट जल सीधे क्षिप्रा नदी में बहा रहे हैं। यह खुलासा संयुक्त समिति की रिपोर्ट में हुआ है। एनजीटी ने आदेश दिए हैं कि सीवेज को शिप्रा में मिलने से रोकें।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सिंहस्थ-2028 से पहले मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी के संरक्षण एवं पुनर्जीवन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। संयुक्त समिति द्वारा एनजीटी को सौंपी गई हालिया रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, धार्मिक नगरी उज्जैन में वर्तमान में लगभग 85 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) सीवेज उत्पन्न हो रहा है। वर्ष 2028 में लगने वाले कुम्भ के दौरान देश-विदेश से आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण यह सीवेज बढ़कर लगभग 350 एमएलडी तक पहुँचने की संभावना है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सिंहस्थ-2028 से पहले शिप्रा नदी के जल को लेकर पाया कि पवित्र क्षिप्रा नदी के पानी में क्षिप्रा नदी के जल के नमूनों में वर्तमान में स्नान करने योग्य भी नहीं बचा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के वर्ष 2022-23 के आंकड़ों के आधार पर क्षिप्रा नदी के एक बड़े हिस्से को प्रदूषित नदी क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया था। क्षिप्रा नदी के जल के नमूनों में बीओडी 8 से 12 एमजी/एल पाया गया है। जबकि नियमों के अनुसार, सुरक्षित स्नान योग्य जल के लिए इसका मानक अधिकतम 3 एमजी/एल होना चाहिए। जाँच में सामने आया कि उज्जैन का सदावल वेस्ट स्टेबलाइजेशन पॉन्ड निर्धारित बीओडी मानकों का पालन करने में पूरी तरह विफल रहा है। 3 बड़े नाले का पानी शिप्रा में मिल रहा है। उज्जैन क्षेत्र के कुल 14 नालों में से 11 नालों को बंद करने का दावा किया गया है, लेकिन पीलियाखाल, हाटकेश्वर और भैरवगढ़ नाले आज भी बिना ट्रीटमेंट किया हुआ और जहरीला अपशिष्ट जल सीधे क्षिप्रा नदी में बहा रहे हैं। नदी की इस दुर्दशा पर कड़ा संज्ञान लेते हुए एनजीटी ने कड़े कानूनी और सुधारात्मक निर्देश जारी किए हैं, जिसमें सीवेज पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए नगर निगम उज्जैन और जिला कलेक्टर उज्जैन को सख्त आदेश दिया गया है कि किसी भी परिस्थिति में किसी भी जलस्रोत या गंदे पानी का डिस्चार्ज नहीं होना चाहिए। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) को निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रत्येक 15 दिन के अंतराल पर नदी और नालों का अनिवार्य रूप से निरीक्षण करें। यदि किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो प्रदूषण बोर्ड को तत्काल कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करने तथा दोषी अधिकारियों व संस्थाओं से पर्यावरण मुआवजा वसूलने के भी आदेश दिए गए हैं।
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