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4 रुपये में करो बच्चे का पोषण, इतना ही दे रही सरकार, यह कैसा सशक्तिकरण…महंगाई ने बढाई मुश्किल

August 31, 2026

  • 6 माह में 34 ग्राम, 13-24 माह में 44 ग्राम और उम्र के साथ बढ़ती गई भोजन की मात्रा मेहनत और सामान का रेट वही

इन्दौर। कुपोषित बच्चों के लिए सरकार ने एक-एक ग्राम पोषण का हिसाब रखा है, लेकिन यह पोषण आहार तैयार करने वाली महिलाओं की मेहनत का हिसाब महज 4 रु प्रति बच्चे में समेट दिया। बच्चे की उम्र और वजन बढ़ा तो उसकी डाइट बढ़ा दी गई, अलग-अलग सामग्री और मात्रा तय कर दी गई, लेकिन उस बढ़ी हुई डाइट को तैयार करने वाली स्व-सहायता समूह की महिलाओं का मेहनताना नहीं बढ़ा।

कुपोषण दूर करने के साथ-साथ गांव की महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकार द्वारा शुरू की गई पहल अच्छी कहीं जाए या मुसीबत वाली महिलाएं समझ नहीं पा रही हैं। प्रति बच्चा पोषण आहार उपलब्ध कराने के लिए महिलाओं को 4 रुपये का भुगतान किया जा रहा है सरकार ने जो सूची बनाकर भेजी है उसके आधार पर 6 से 12 माह के बच्चे के लिए 34 ग्राम से लेकर बड़ी उम्र के बच्चों के लिए अधिक मात्रा में पोषण आहार तैयार करना है, मगर भुगतान की दर एक ही है।

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वजन बढ़ाया तो काम भी बढ़ा
सरकार ने 6 से 12 माह के अति कुपोषित और मध्यम कुपोषित बच्चों के लिए प्रतिदिन 34 ग्राम पोषण आहार तय किया है। चना सत्तू और गुड़ से यह आहार तैयार किया जाना है। इसके बाद 13 से 24 माह के बच्चों के लिए मात्रा बढ़ाकर 44 ग्राम कर दी गई। यानी उम्र बढऩे के साथ बच्चे के हिस्से में 10 ग्राम अतिरिक्त पोषण आहार जुड़ गया। 25 से 36 माह के कुपोषित और अति कुपोषित बच्चों के लिए भुना चना, मुरमुरा, गुड़, चना और सत्तू जैसी सामग्री शामिल की गई है। 37 से 60 माह के बच्चों के लिए भी उम्र और वजन के हिसाब से डाइट तय है। यानी बच्चे की जरूरत के साथ सामग्री और मात्रा का पूरा गणित तैयार है, लेकिन कीमत का भुगतान सिर्फ 4 रुपये ही किया जाएगा अब ऐसे में महिलाएं पोषण आहार पैकेट कैसे तैयार करेंगे, इस पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं।

ज्यादा मात्रा, ज्यादा मेहनत… फिर भी 4 रुपए
इन सामग्रियों को महिलाओं को तौलना है, तैयार करना है और पैक करना है। 34 ग्राम की मात्रा हो या 44 ग्राम टाइम मेनू के आधार पर ही पोषण आहार दिया जाना है, इसके बावजूद प्रति बच्चे भुगतान एक ही रखा गया है। यानी की बच्चे के हिस्से में ग्राम बढ़ते गए, लेकिन महिला के हिस्से में एक रुपया भी नहीं बढ़ा। स्व-सहायता समूहों से यह काम कराने का उद्देश्य महिलाओं को रोजगार से जोडऩा और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करना बताया जाता है, लेकिन यही नीति अब महिलाओं को मुसीबत में डाल रही है। उनके अनुसार कीमत तय करते समय यह आंकलन नहीं किया गया कि अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए अलग मात्रा में सामग्री तौलने, तैयार करने और पैक करने में कितना समय व 34 ग्राम और 44 ग्राम की सामग्री तैयार करने का खर्च कितना आता है। एक तरफ कुपोषण से लडऩे के लिए बच्चे की उम्र, वजन और भोजन की मात्रा तक का हिसाब रखा जा रहा है। दूसरी तरफ उसी भोजन को तैयार करने वाली महिलाओं के श्रम का मूल्यांकन सही नही किया गया है। बच्चे का वजन बढ़ा तो डाइट बढ़ी, सामग्री बढ़ी, काम बढ़ा, लेकिन महिलाओं का मेहनताना नहीं बढ़ा।

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