नई दिल्ली। यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों (Houthi rebels) की बढ़ती गतिविधियों ने सऊदी अरब (Red Sea) के साथ-साथ लाल सागर (Red Sea) के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। हूतियों के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोचा पर कब्जे से बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास उनकी पकड़ मजबूत हुई है। यह जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और यूरोप तथा एशिया के बीच समुद्री व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
हूतियों की बढ़त के बीच सऊदी अरब को पाकिस्तान से सैन्य सहयोग की उम्मीद थी, लेकिन इस्लामाबाद ने फिलहाल किसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से दूरी बना ली है। दूसरी ओर अमेरिका ने सऊदी अरब की सहायता के लिए अपने सैन्य सलाहकारों को तैनात किया है।
हूती लड़ाके यमन के पश्चिमी तट पर लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं। मोचा पर कब्जे को उनके अभियान की बड़ी सफलता माना जा रहा है। बाब-अल-मंदेब के करीब स्थित इस बंदरगाह पर नियंत्रण मजबूत होने से हूतियों की लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित करने की क्षमता बढ़ सकती है।
बाब-अल-मंदेब लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच अहम संपर्क मार्ग है। यूरोप और एशिया के बीच होने वाले समुद्री व्यापार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां लंबे समय तक अस्थिरता रहने पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपूर्ति शृंखला पर असर पड़ने की आशंका है।
हूतियों और सऊदी अरब समर्थित यमनी सरकार के बीच वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद युद्धविराम हुआ था। इसके बाद संघर्ष की तीव्रता में कमी आई, लेकिन यमन का विभाजन बना रहा।
हाल के दिनों में हूतियों और सऊदी अरब के बीच तनाव फिर बढ़ा है। इससे पहले अगस्त में हूतियों ने मोचा पर ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया था। यमनी सेना के मुताबिक इस हमले में सात लोगों की मौत हुई और 30 लोग घायल हुए थे। अब इसी रणनीतिक शहर पर हूतियों के कब्जे ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
हूतियों के हमलों के बाद सऊदी अरब की नजर पाकिस्तान पर भी थी। पिछले महीने पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच संयुक्त रक्षा समझौता हुआ था। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे तीनों देशों पर हमला माना जाना है।
ऐसे में जब हूतियों ने सऊदी शहरों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया तो यह सवाल उठने लगा कि क्या पाकिस्तान समझौते के तहत सऊदी अरब की सैन्य सहायता करेगा। हालांकि, पाकिस्तान ने फिलहाल प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई से इनकार किया है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि फिलहाल इस तरह की किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि जब जरूरत का समय आएगा, तब पाकिस्तान समझौते के तहत कार्रवाई करेगा।
पाकिस्तान की तत्काल सैन्य मदद नहीं मिलने के बीच अमेरिका सऊदी अरब के समर्थन में आगे आया है। CNN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सैन्य अधिकारियों और मामले से परिचित सूत्रों ने बताया कि सऊदी अरब में 100 से अधिक अमेरिकी सैन्य सलाहकार मौजूद हैं। कुछ अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इनकी संख्या करीब 200 तक हो सकती है।
अमेरिकी सैन्यकर्मी सीधे हूती ठिकानों पर हमले में शामिल नहीं हैं। अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया जानकारी और लक्ष्यों की पहचान में सहायता दे रहा है। इसके अलावा ऐसी तकनीकी मदद भी दी जा रही है, जिससे सऊदी सैन्य अधिकारी युद्ध क्षेत्र की स्थिति को वास्तविक समय में देख सकें।
फिलहाल अमेरिकी सहायता को सीमित रखा गया है। अमेरिकी सैनिक सीधे हवाई हमलों में शामिल नहीं हैं और न ही अमेरिकी सेना सऊदी लड़ाकू विमानों में ईंधन भरने अथवा अन्य प्रत्यक्ष सैन्य अभियानों में सहयोग कर रही है।
अमेरिका की चिंता केवल सऊदी अरब की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। उसकी नजर बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर भी है। होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए संकट के कारण वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ा है। अमेरिका नहीं चाहता कि बाब-अल-मंदेब की स्थिति भी होर्मुज जैसी हो जाए।
यदि लाल सागर का यह समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो यूरोप और एशिया के बीच होने वाले वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिका को यह आशंका भी है कि ईरान हूतियों को समर्थन बढ़ाकर बाब-अल-मंदेब की आवाजाही बाधित करने की कोशिश कर सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यमन में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के सैकड़ों अधिकारी हूती लड़ाकों के साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में हूतियों की बढ़ती ताकत को क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए भी गंभीर चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
©2026 Agnibaan , All Rights Reserved