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BRICS में चीन का ‘दबाव’: भारत का व्यापार घाटा ₹19 लाख करोड़ पहुंचा, आयात ने बिगाड़ा खेल

September 11, 2026

नई दिल्ली. BRICS का दायरा लगातार बढ़ रहा है और भारत(India) इसे ग्लोबल ट्रेड (Global Trade) और आर्थिक सहयोग के बड़े मंच के तौर पर देखता है. लेकिन ताजा आंकड़े एक दूसरी तस्वीर भी दिखाते हैं. BRICS देशों के साथ भारत का कारोबार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है. लेकिन इसी के साथ व्यापार घाटा भी तेजी से बढ़ा है. सबसे बड़ी वजह चीन से बढ़ता आयात है, जिस वजह से भारत का डेफिसिट लगातार ऊंचा बना हुआ है.

BRICS देशों के साथ 226 अरब डॉलर का ट्रेड डेफिसिट
2025-26 में भारत ने BRICS के 10 साझेदार देशों से करीब 321.8 अरब डॉलर का सामान आयात किया. वहीं इन देशों को भारत का निर्यात करीब 95.7 अरब डॉलर रहा. यानी BRICS देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 226.1 अरब डॉलर, या करीब 19 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इसमें सबसे बड़ा योगदान चीन का रहा. भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 112.2 अरब डॉलर रहा, जबकि दोनों देशों के बीच कुल कारोबार रिकॉर्ड 155 अरब डॉलर तक पहुंच गया. इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर इक्विपमेंट और बैटरी जैसे कई अहम सेक्टरों में भारत अब भी चीन पर काफी हद तक निर्भर है.

लोकल करेंसी में कारोबार बढ़ाने पर जोर
बढ़ते व्यापार घाटे के बीच BRICS देशों के बीच अपनी-अपनी करेंसी में कारोबार बढ़ाने की कोशिश भी तेज हुई है. इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में डॉलर पर निर्भरता कम करना और भुगतान व्यवस्था को ज्यादा लचीला बनाना है. हालांकि फिलहाल डॉलर की जगह किसी नई साझा मुद्रा या सिस्टम को लागू करने का कोई फैसला नहीं हुआ है. लेकिन सदस्य देशों के बीच लोकल करेंसी में ट्रेड और क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट को आसान बनाने पर चर्चा जारी है.

डिजिटल पेमेंट सिस्टम को जोड़ने की तैयारी
BRICS देशों के बीच डिजिटल पेमेंट को आसान बनाने पर भी काम चल रहा है. भारत के UPI और ब्राजील के Pix जैसे प्लेटफॉर्म के बीच इंटरऑपरेबिलिटी की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है. इसके अलावा सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC के जरिए सीमा पार भुगतान को तेज और कम लागत वाला बनाने के विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं. हालांकि अभी तक कोई साझा BRICS Pay सिस्टम लागू नहीं हुआ है. मौजूदा प्रयासों का फोकस अलग-अलग देशों की डिजिटल भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल बनाना है.

MSME के लिए आसान हो सकता है ट्रेड फाइनेंस
BRICS देशों ने छोटे और मझोले कारोबारियों यानी MSME सेक्टर के लिए फाइनेंस तक पहुंच आसान बनाने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं. सदस्य देश एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड MSME के लिए नए क्रेडिट असेसमेंट फ्रेमवर्क और इनवॉयस डिस्काउंटिंग जैसे विकल्पों पर काम कर रहे हैं. मकसद है कि छोटे कारोबारियों का ट्रेड फाइनेंस गैप कम हो और उन्हें भारी कोलैटरल के आधार पर नहीं, उनके कारोबार और कैश फ्लो के आधार पर भी फाइनेंस मिल सके. हालांकि ये पहल अभी शुरुआती फेज में हैं और इन्हें लागू होने में समय लग सकता है.

सप्लाई चेन-डिजिटल सर्विसेज पर भी फोकस
भारत BRICS के भीतर सप्लाई चेन सहयोग को मजबूत करने पर भी जोर दे रहा है. फार्मा, कृषि और फूड सिक्योरिटी जैसे सेक्टर्स में सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की कोशिश हो रही है, जिससे किसी एक देश या इलाके पर ज्यादा निर्भरता का जोखिम कम किया जा सके. इसके साथ ही सीमा पार डिजिटल सर्विसेज को आसान बनाने की दिशा में भी काम चल रहा है. इससे भारतीय IT और डिजिटल सर्विस कंपनियों के लिए दूसरे BRICS देशों में नए कारोबारी अवसर पैदा हो सकते हैं. यानी BRICS अब केवल सामान के कारोबार का मंच नहीं रह गया है. ट्रेड, पेमेंट, सप्लाई चेन और डिजिटल सर्विसेज जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर सदस्य देश आर्थिक रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं. भारत के लिए चुनौती यो होगी कि बढ़ते कारोबार के साथ व्यापार घाटे को कैसे संतुलित किया जाए.

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