कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के संगठन और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही खींचतान अब चुनाव आयोग (EC) तक पहुंच चुकी है। पार्टी पर अधिकार को लेकर ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी (Mamata Banerjee and Ritabrata Banerjee) के नेतृत्व वाले धड़ों के बीच जारी विवाद के बीच निर्वाचन आयोग ने शनिवार को दोनों पक्षों से मुलाकात की और उनके दावों के समर्थन में दस्तावेज व सबूत पेश करने को कहा।
ममता बनर्जी गुट की ओर से आयोग के समक्ष पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल पहुंचा। इसमें डेरेक ओ’ब्रायन, कल्याण बनर्जी, सागरिका घोष, साकेत गोखले और अधिवक्ता अभिनव सिंह शामिल थे। नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा उपचुनाव से पहले दोनों गुटों के बीच बढ़े विवाद के बीच हुई इस बैठक में ममता गुट ने दावा किया कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को लेकर कोई विवाद नहीं है।
निर्वाचन आयोग से मुलाकात के बाद ममता बनर्जी गुट ने अपने बयान में कहा कि पार्टी के संगठन को लेकर किसी तरह का विवाद नहीं है। उसका तर्क था कि विरोधी गुट के समर्थन में खड़े विधायक महज पांच महीने पहले ही टीएमसी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े थे। वहीं, ममता बनर्जी ने उस समय पार्टी के चुनाव चिन्ह से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे।
ममता गुट ने आयोग के सामने यह भी दावा किया कि आज पार्टी पर अधिकार जताने वाले नेताओं को चुनाव के दौरान पार्टी फंड से 25-25 लाख रुपये भेजे गए थे।
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि टीएमसी में संगठनात्मक चुनाव लगातार निर्धारित प्रक्रिया के तहत होते रहे हैं। पार्टी में हर पांच साल में संगठनात्मक चुनाव के जरिए पहले अध्यक्ष और उसके बाद राष्ट्रीय कार्यसमिति का चुनाव किया गया। ममता गुट के मुताबिक ये चुनाव 2006, 2011, 2017 और 2022 में हुए थे और उस समय पार्टी पर दावा करने वाले नेता कहीं नजर नहीं आए।
ममता गुट ने पूरे विवाद को ‘‘ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी’’ और ‘‘कुछ गद्दारों के समूह’’ के बीच का मामला बताया। अपने बयान में उसने विरोधी धड़े के नेताओं के लिए ‘गद्दार’ शब्द का इस्तेमाल किया।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने भी चुनाव आयोग के सामने अपना पक्ष रखा। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने आयोग से मुलाकात के बाद मीडिया से कहा कि उनके गुट ने अपनी दलीलें और दस्तावेज आयोग को सौंप दिए हैं।
उन्होंने भरोसा जताया कि टीएमसी का चुनाव चिन्ह उनके गुट को ही मिलेगा। ऋतब्रत ने कहा कि कुछ और दस्तावेज भी उसी दिन आयोग के समक्ष जमा किए जाएंगे और अब उन्हें निर्वाचन आयोग के फैसले का इंतजार है।
ऋतब्रत बनर्जी ने यह भी बताया कि उनके गुट ने आयोग से अनुरोध किया है कि मामले पर 16 सितंबर से पहले फैसला सुनाया जाए। इसकी वजह पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख है। उपचुनावों के चलते पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर चल रहा विवाद और भी अहम हो गया है, क्योंकि उम्मीदवारों को तय समय सीमा के भीतर नामांकन दाखिल करना है।
टीएमसी के भीतर मौजूदा विवाद की शुरुआत पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद हुई। 4 मई को चुनाव परिणाम सामने आने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष के स्वर तेज होने लगे। 6 मई के घटनाक्रम में कई नेताओं की ओर से हार की जिम्मेदारी अभिषेक बनर्जी पर डालने की कोशिशें सामने आईं।
इसके बाद नए विधायक ऋतब्रत बनर्जी की भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात ने पार्टी के भीतर बगावत की चर्चाओं को और हवा दे दी। बाद में ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने शिकायत की कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन से जुड़े दस्तावेजों पर उनके हस्ताक्षर उनकी सहमति के बिना किए गए हैं। इसके बाद मामले की जांच शुरू हुई और ममता बनर्जी ने दोनों नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया।
इसके बाद टीएमसी में टूट का सिलसिला तेज होता गया। 2 जून को खुली बगावत के बाद कई विधायक और सांसद पार्टी से अलग होते चले गए। हालात यहां तक पहुंच गए कि लंबे समय तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज रही ममता बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद भी बागी धड़े के हाथों गंवाना पड़ा।
फिलहाल टीएमसी के नाम और चुनाव चिन्ह पर दोनों गुटों का दावा चुनाव आयोग के सामने है। अब अंतिम फैसला निर्वाचन आयोग को करना है कि पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह किस धड़े के पास रहेगा।
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