
नई दिल्ली। भारत के खिलाफ कथित आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने के मामले में गिरफ्तार अमेरिकी नागरिक मैथ्यू आरोन वैनडाइक को दिल्ली की विशेष NIA अदालत ने डिफॉल्ट जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि जांच की निर्धारित 180 दिन की अवधि पूरी होने के बावजूद UAPA के तहत जांच लंबित थी और NIA ने इस अवधि के दौरान केवल इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 की धाराओं 21 और 23 के तहत चार्जशीट दाखिल की।
विशेष NIA जज प्रशांत शर्मा ने 18 सितंबर के आदेश में कहा कि अधूरी चार्जशीट दाखिल कर जांच एजेंसी आरोपी को डिफॉल्ट जमानत के वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। वैनडाइक मार्च में गिरफ्तार किए गए सात विदेशी नागरिकों में शामिल था और इस मामले की जांच NIA कर रही है।
13 मार्च को हुई थी गिरफ्तारी
वैनडाइक को 13 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। UAPA से जुड़े मामलों में विशेष परिस्थितियों में जांच पूरी करने की अवधि 180 दिन तक बढ़ाई जा सकती है। अदालत के मुताबिक, उसके मामले में यह अवधि 8 सितंबर को पूरी हो गई।
NIA ने भी इसी दिन चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, अदालत ने पाया कि इसमें केवल इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 की धाराएं शामिल थीं, जबकि UAPA के तहत जांच अभी पूरी नहीं हुई थी।
इसके बाद वैनडाइक की ओर से अधिवक्ता रोहित दंद्रियाल और रोहित गौर ने BNSS की धारा 187(3) और UAPA की धारा 43D(2) के तहत डिफॉल्ट जमानत की मांग की।
अधूरी चार्जशीट से नहीं छीना जा सकता जमानत का अधिकार
अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी केवल अधूरी चार्जशीट दाखिल करके आरोपी को डिफॉल्ट जमानत के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। जज ने कहा कि इस स्तर पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वैनडाइक डिफॉल्ट जमानत का हकदार नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी अधूरी चार्जशीट दाखिल करके BNSS की धारा 187(3) के प्रावधानों को दरकिनार नहीं कर सकती। यह प्रावधान पहले CrPC की धारा 167(2) के तहत लागू होता था।
क्या है डिफॉल्ट जमानत?
डिफॉल्ट या वैधानिक जमानत का अधिकार तब पैदा होता है, जब कानून में तय समय सीमा के भीतर जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल नहीं की जाती। BNSS की धारा 187(3) के तहत सामान्य तौर पर गंभीर अपराधों में जांच की अधिकतम अवधि 90 दिन, जबकि अन्य मामलों में 60 दिन होती है।
UAPA के मामलों में धारा 43D(2) के तहत यह अवधि विशेष अदालत द्वारा बढ़ाकर 180 दिन तक की जा सकती है। इसके लिए सरकारी वकील की ओर से निर्धारित कानूनी शर्तों के अनुरूप रिपोर्ट पेश करना जरूरी होता है।
वैनडाइक के मामले में अदालत ने माना कि 180 दिन की अवधि पूरी हो चुकी थी, जबकि UAPA से संबंधित जांच अभी लंबित थी। इसी आधार पर डिफॉल्ट जमानत का रास्ता खुला।
सह-आरोपियों को भी मिल सकता है लाभ
अदालत ने अपने आदेश में मामले के अन्य आरोपियों के अधिकारों पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सह-आरोपी भी मामले के तथ्यों और कानून की लागू शर्तों के आधार पर डिफॉल्ट जमानत के हकदार हो सकते हैं।
अदालत की यह टिप्पणी इस मामले में गिरफ्तार अन्य आरोपियों की जमानत अर्जियों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, प्रत्येक आरोपी की जमानत का फैसला उसके मामले के अलग-अलग तथ्यों और कानूनी स्थिति के आधार पर होगा।
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