
नई दिल्ली ।पितृ पक्ष (Pitru Paksha) 2026 की शुरुआत 27 सितंबर से हो चुकी है और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या (Amavasya)के साथ इसका समापन होगा। यह अवधि पितरों (Ancestors) के स्मरण, श्राद्ध (Shraddha), तर्पण (Tarpan), पिंडदान और दान-पुण्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दौरान कई परिवार खानपान और रोजमर्रा के व्यवहार से जुड़े कुछ नियमों का पालन करते हैं। हालांकि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में इन परंपराओं में अंतर हो सकता है।
पितृ पक्ष के दौरान आम तौर पर सात्विक भोजन, संयम और शांत वातावरण पर जोर दिया जाता है। कई परिवार इन दिनों मांसाहार, शराब और अन्य नशीले पदार्थों से दूरी रखते हैं। भोजन तैयार करते समय साफ-सफाई और शुद्धता का ध्यान रखने की परंपरा भी है।
श्राद्ध पक्ष में कई परिवार बाल और नाखून काटने से बचते हैं। कुछ लोग पूरे पितृ पक्ष में इस परंपरा का पालन करते हैं, जबकि कुछ परिवारों में ऐसा कोई नियम नहीं होता। इसलिए इस संबंध में पारिवारिक परंपरा को प्राथमिकता दी जा सकती है।
पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध कर्म का समय माना जाता है। इसी वजह से कई परिवार इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य बड़े मांगलिक कार्यक्रमों को टालते हैं। भव्य उत्सव या नए शुभ कार्यों की शुरुआत भी पितृ पक्ष समाप्त होने के बाद करने की परंपरा है।
इस दौरान घर का वातावरण शांत रखने पर भी जोर दिया जाता है। बेवजह विवाद, गुस्सा और कलह से बचने की सलाह दी जाती है। पितरों के प्रति सम्मान और आत्मसंयम के साथ इस अवधि को पूरा करने की परंपरा है।
पितृ पक्ष में दान और सेवा को भी महत्व दिया जाता है। इसलिए बुजुर्गों, जरूरतमंदों या किसी अन्य व्यक्ति का अपमान करने से बचना चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन, वस्त्र या अन्य जरूरी चीजों का दान करने की परंपरा भी कई जगहों पर है।
इस अवधि में झूठ, छल-कपट और धोखे से दूर रहने पर जोर दिया जाता है। किसी के साथ गलत व्यवहार करने या गलत तरीके से धन कमाने जैसी गतिविधियों से बचने की परंपरा बताई जाती है। इसी तरह श्राद्ध के लिए तैयार भोजन को बर्बाद नहीं करना चाहिए। जरूरत के अनुसार भोजन बनाकर उसे जरूरतमंदों को देने और अन्न का दान करने की परंपरा भी कई स्थानों पर है।
श्राद्ध की तारीख निर्धारित करते समय संबंधित हिंदू तिथि को महत्वपूर्ण माना जाता है। जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है। तिथि को लेकर भ्रम होने पर स्थानीय पंचांग की सहायता ली जा सकती है।
इस वर्ष 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध होगा। तिथि क्षय के कारण दोनों श्राद्ध एक ही दिन पड़ रहे हैं। इसलिए श्राद्ध की तारीख तय करते समय 2026 की पूरी तिथि सूची देखना जरूरी है।
पितृ पक्ष की प्रमुख तिथियों में 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 27 सितंबर को प्रतिपदा, 28 को द्वितीया, 29 को तृतीया और 30 सितंबर को चतुर्थी-पंचमी श्राद्ध शामिल हैं। इसके बाद 1 अक्टूबर को षष्ठी, 2 को सप्तमी, 3 को अष्टमी, 4 को नवमी, 5 को दशमी, 6 को एकादशी, 7 को द्वादशी, 8 को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध होगा।
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा। जिन पितरों की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं है या निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की परंपरा बताई जाती है।
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