नई दिल्ली । हिंद महासागर (Indian Ocean) में स्थित सेशेल्स (Seychelles) के अल्डाब्रा एटोल (Aldabra Atoll) पर विशाल कछुओं (Giant Tortoises) की आबादी लगभग 1.83 लाख आंकी गई है। यह संख्या पूरे सेशेल्स की करीब 1.35 लाख की मानव आबादी (Human Population) से अधिक है। वैज्ञानिकों (Scientists) के एक नए सर्वेक्षण (Survey) में सामने आया है कि यहां दुनिया में प्राकृतिक वातावरण में स्वतंत्र रूप से रहने वाले विशाल कछुओं की सबसे बड़ी आबादी मौजूद है। कभी बड़े पैमाने पर शिकार के कारण विलुप्त होने के खतरे (Extinction Threat) का सामना करने वाली इस प्रजाति की संख्या में सुधार संरक्षण (Conservation) के लंबे प्रयासों से संभव हुआ है।
इस अध्ययन के लिए 2018 से 2022 के बीच जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। सर्वेक्षण में वयस्क और लगभग वयस्क कछुओं की संख्या का अनुमान लगाया गया। शोधकर्ताओं ने उन कछुओं को भी गणना में शामिल करने का प्रयास किया, जो घनी झाड़ियों, पेड़ों और छायादार स्थानों में छिपे होने के कारण आसानी से दिखाई नहीं देते। अध्ययन के निष्कर्ष वैज्ञानिक पत्रिका इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित हुए हैं।
अल्डाब्रा एटोल पर कछुओं की आबादी का इससे पहले व्यापक अनुमान 1990 के दशक के आखिरी वर्षों में लगाया गया था। उस समय यहां लगभग एक लाख विशाल कछुए होने की बात सामने आई थी। नए अध्ययन में यह संख्या करीब 1.83 लाख आंकी गई है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि 1999 के बाद इनकी आबादी लगभग दोगुनी हो गई है। पुराने सर्वेक्षणों में घनी वनस्पतियों के बीच छिपे कई कछुओं की गिनती नहीं हो पाती थी। इस बार उनकी दृश्यता में अंतर और दिखाई नहीं देने वाले कछुओं की संभावित संख्या को ध्यान में रखकर अनुमान तैयार किया गया।
19वीं सदी में बड़े पैमाने पर शिकार के कारण अल्डाब्रा के विशाल कछुओं की आबादी घटकर एक हजार से भी कम रह गई थी। इसके बाद इस प्रजाति को बचाने के लिए संरक्षण के प्रयास किए गए। वर्ष 1981 में अल्डाब्रा को संरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र घोषित किया गया और 1982 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। लंबे समय तक सुरक्षा, निगरानी और प्राकृतिक आवास के संरक्षण से कछुओं की आबादी को दोबारा बढ़ने में मदद मिली। नए सर्वेक्षण के मुताबिक, 2018 से 2022 के दौरान इनकी आबादी अपेक्षाकृत स्थिर रही।
अध्ययन में कछुओं के प्राकृतिक आवास और उनके वितरण का भी आकलन किया गया। शोधकर्ताओं को घास वाले क्षेत्रों में इनकी सबसे अधिक सघनता मिली। ऐसे इलाकों को टॉरटॉइज टर्फ कहा जाता है। खुले और कम झाड़ियों वाले स्थानों पर भी कछुओं की संख्या अधिक पाई गई। इसके विपरीत, घनी झाड़ियों, मैंग्रोव और पेम्फिस पौधों वाले क्षेत्रों में उन्हें देखना कठिन था। इस अंतर को ध्यान में रखने से आबादी का अधिक विश्वसनीय अनुमान तैयार करने में सहायता मिली।
हालांकि, कछुओं की मौजूदा स्थिति बेहतर होने के बावजूद उनके सामने कई पर्यावरणीय खतरे बने हुए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में सूखे की अवधि लंबी हो सकती है और ऐसे हालात बार-बार पैदा हो सकते हैं। इससे कछुओं के लिए भोजन और छाया की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर भी एटोल के निचले हिस्सों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
इसके अतिरिक्त, जंगली बिल्लियां और काले चूहे कछुओं के अंडों तथा नवजात बच्चों को नुकसान पहुंचाते हैं। पहले जंगली बकरियां भी यहां की वनस्पतियों को प्रभावित करती थीं, लेकिन 2012 में उन्हें हटा दिया गया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि जंगली बिल्लियों और चूहों जैसे बाहरी आक्रामक जीवों पर नियंत्रण से कछुओं की सुरक्षा बेहतर हो सकती है। आबादी का यह नया अनुमान भविष्य में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए आधार उपलब्ध कराता है। नियमित सर्वेक्षण से वैज्ञानिक सूखे, जलवायु परिवर्तन और अन्य खतरों के प्रभावों का आकलन कर सकेंगे तथा जरूरत पड़ने पर संरक्षण के कदम उठाए जा सकेंगे।
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