नई दिल्ली । करीब 96 फीसदी (Muslim population)मुस्लिम आबादी वाले अजरबैजान (Azerbaijan)में स्कूलों के ड्रेस कोड को लेकर बड़ा विवाद (Major controversy)खड़ा हो गया है। सरकार के नए नियम लागू होने के बाद हिजाब पहनकर स्कूल पहुंचने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश नहीं मिलने की शिकायतें सामने आई हैं। इसके विरोध में छात्राओं ने प्रदर्शन किए और कई जगहों पर दूसरी छात्राओं ने भी उनका समर्थन करते हुए कक्षाओं का बहिष्कार किया। मामला अब केवल स्कूल यूनिफॉर्म तक सीमित नहीं रहा बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता शिक्षा के अधिकार और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की सीमाओं पर बहस शुरू हो गई है। इस घटनाक्रम ने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा है कि मुस्लिम बहुल देश में धार्मिक पहनावे को लेकर सरकार और विद्यार्थियों के बीच टकराव क्यों पैदा हुआनई दिल्ली ।
अजरबैजान की आबादी का बड़ा हिस्सा इस्लाम को मानता है और देश में शिया मुसलमान बहुसंख्यक हैं। इसके बावजूद वहां की संवैधानिक व्यवस्था धर्म और राज्य को अलग रखने के सिद्धांत पर आधारित है। संविधान के अनुच्छेद 7 में देश को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बताया गया है जबकि अनुच्छेद 18 धर्म को राज्य से अलग रखने और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को धर्मनिरपेक्ष बनाने की बात करता है। दूसरी ओर संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है। इसी वजह से स्कूलों में हिजाब को लेकर उठे सवाल ने एक नई बहस को जन्म दिया है कि शिक्षा व्यवस्था में समान नियम लागू करने और व्यक्तिगत धार्मिक अधिकारों की रक्षा करने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
विवाद की प्रमुख वजह 21 सितंबर को अजरबैजान की कैबिनेट की ओर से पारित प्रस्ताव को माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार सरकारी सामान्य शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों के लिए निर्धारित वर्दी के नियमों को लागू करने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के अनुरूप एक समान ड्रेस कोड बनाए रखना बताया गया। आदेश में हिजाब पर सीधे प्रतिबंध लगाने का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग अतिरिक्त कपड़ों को लेकर नियम सख्त किए गए। कई स्कूलों में इन नियमों की व्याख्या इस तरह की गई कि हिजाब पहनकर आने वाली छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश नहीं दिया गया। गौर करने वाली बात यह है कि अजरबैजान में आम नागरिकों के हिजाब पहनने पर देशव्यापी प्रतिबंध की बात नहीं कही गई है। विवाद मुख्य रूप से स्कूलों की वर्दी और उसके क्रियान्वयन को लेकर है।
मामला केवल छात्राओं तक सीमित नहीं रहा। 6 अक्टूबर को शिक्षकों के लिए भी अलग ड्रेस कोड से जुड़े नियम स्वीकृत किए गए। इसके बाद हिजाब पहनने वाली महिला शिक्षकों पर भी सिर ढकने वाला कपड़ा हटाने का दबाव बनाए जाने की खबरें सामने आईं। शिक्षिका जहरा हसनोवा ने कहा कि हिजाब पहनना उनका व्यक्तिगत चुनाव है और इसे जबरन हटाने का दबाव उनके लिए भावनात्मक विषय है। कुछ स्कूलों में छात्राओं को प्रवेश से रोके जाने के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए। इन घटनाओं के बाद छात्राओं और उनके समर्थकों ने विरोध दर्ज कराया। बाकू और मसल्ली जिले में कुछ विद्यार्थियों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और सड़क पर पढ़ाई करते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि धार्मिक पहनावा शिक्षा हासिल करने में बाधा नहीं बनना चाहिए।
विरोध के बीच प्रशासन ने भी सख्त रुख अपनाया। अजरबैजान के गृह मंत्रालय ने 12 अक्टूबर को बताया कि स्कूल यूनिफॉर्म से जुड़े नियमों को लागू करने के दौरान 37 लोगों को गिरफ्तार किया गया। अधिकारियों का आरोप है कि कुछ लोगों ने शिक्षा कर्मचारियों के साथ टकराव किया और स्कूलों तथा यातायात के सामान्य संचालन में बाधा पहुंचाई। वहीं विरोध करने वालों का कहना है कि हिजाब पहनने वाली छात्राओं को कक्षाओं से बाहर रखना उनके शिक्षा के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल है। ऐसे में विवाद के दोनों पक्षों को समझना जरूरी है। एक ओर सरकार समान ड्रेस कोड और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा की व्यवस्था बनाए रखने की बात करती है तो दूसरी ओर छात्राएं अपने धार्मिक विश्वास के अनुरूप कपड़े पहनने की स्वतंत्रता की मांग कर रही हैं।
अजरबैजान में स्कूलों में हिजाब को लेकर विवाद पहली बार नहीं उठा है। दिसंबर 2010 में भी स्कूल यूनिफॉर्म के नियमों के आधार पर हिजाब पर रोक लगाने की कोशिश के बाद विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय भी धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के बीच टकराव सामने आया था। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ क्या होना चाहिए और स्कूलों में उसकी व्याख्या किस तरह की जाए। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार नियमों को किस तरह लागू करती है और क्या ऐसा रास्ता निकलता है जिसमें शिक्षा व्यवस्था के अनुशासन के साथ छात्राओं के संवैधानिक अधिकारों का भी सम्मान हो सके।