
नई दिल्ली। दिवाली (Diwali) पर पटाखों की गूंज (firecrackers Noise) पलभर की खुशी दे सकती है, लेकिन तेज शोर कानों को हमेशा के लिए नुकसान (Hearing loss) पहुंचा सकता है। भारत (India) में पटाखों के शोर की कानूनी सीमा 125 डेसीबल है। इनके करीब होने पर आवाज इससे कहीं अधिक हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे कान का पर्दा व अंदरूनी हिस्सा क्षतिग्रस्त (Hearing loss) होने के साथ सुनने की क्षमता जा सकती है।
आधे मीटर की दूरी पर 143 डेसीबल तक पहुंच सकता है शोर
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग, मैसूर के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीरज कुमार सिंह के मुताबिक, पटाखों की आवाज चार मीटर पर मापी जाती है। दूरी आधी होने पर शोर छह डेसीबल बढ़ता है। इस हिसाब से 125 डेसीबल का पटाखा आधे मीटर पर 143 डेसीबल तक शोर कर सकता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, अचानक तेज शोर की सीमा वयस्कों के लिए 140 और बच्चों के लिए 120 डेसीबल है।
कान की महीन कोशिकाओं को हो सकता है स्थायी नुकसान
पटाखों का धमाका कान का पर्दा फाड़ने के साथ अंदरूनी हिस्से की हेयर सेल्स को भी नुकसान पहुंचा सकता है। ये कोशिकाएं दोबारा नहीं बनतीं, जिससे सुनने की क्षमता स्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है।
दूरी बनाएं, कानों में रुई नहीं इयरप्लग लगाएं
विशेषज्ञों के मुताबिक, पटाखे फोड़ते समय कम से कम चार-पांच मीटर दूर रहें। बच्चों को फोम इयरप्लग या इयरमफ पहनाएं। रुई शोर से पर्याप्त बचाव नहीं करती। पटाखों के बाद कान में घंटी बजने, दर्द या कम सुनाई देने पर ईएनटी विशेषज्ञ से मिलें। परेशानी 24-48 घंटे रहे तो जांच कराएं।
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