
उज्जैन। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जान बचाने के लिए दिन-रात डटे रहने वाले डॉक्टर खुद गंभीर मानसिक और शारीरिक दबाव में जीवन जी रहे हैं। यह केवल डॉक्टरों की समस्या नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा से भी जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
ये तथ्य फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (फाइमा) के आरएमएस 2.0 सर्वे में सामने आए हैं, जो देश के 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 1,260 से अधिक रेजिडेंट डॉक्टरों पर किया गया। उज्जैन में भी यहीं स्थिति बनी हुई हैं। कई डॉक्टर 24 घंटे से अधिक लगातार और हर पाँच में से एक डॉक्टर सप्ताह में 100 घंटे से ज्यादा काम कर रहा है। चिंताजनक तथ्य यह है कि हर छह में से एक डॉक्टर ने लगातार ड्यूटी से पैदा हो रहे तनाव के बीच आत्महत्या जैसे विचार आने की बात स्वीकार की है।
यह व्यवस्था होना चाहिए लागू
डॉक्टरों की नई भर्ती कर काम का दबाव कम किया जा सकता है। सभी मेडिकल कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता केंद्र, पारदर्शी शिकायत निवारण प्रणाली, बॉन्ड नीति में सुधार और सभी राज्यों में समान स्टाइपेंड दिया जाए।
रेजिडेंट डॉक्टरों के ड्यूटी घंटों का राष्ट्रीय नियमन, लंबी ड्यूटी के बाद अनिवार्य पोस्ट-ड्यूटी रेस्ट देना चाहिए। यह केवल डॉक्टरों की समस्या नहीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा से भी जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
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