
नई दिल्ली । समंदर किनारे डॉल्फिन (Dolphin) और व्हेल (whale) की लाशें बिछी हुई थीं और पानी खून से लाल हो गया था। यह दृश्य डेनमार्क के फारो द्वीप पर हुए एक विवादित आयोजन ‘द ग्रिंड’ के बाद सामने आया, जिसने पूरी दुनिया में बहस छेड़ दी है।
जानकारी के अनुसार, हर साल होने वाले इस पारंपरिक आयोजन में सैकड़ों व्हेल और डॉल्फिन को नावों की मदद से किनारे की ओर खींचा जाता है और उथले पानी में चाकुओं से मार दिया जाता है। इस साल हुए कार्यक्रम में लगभग 700 समुद्री जीवों की हत्या की गई, जिसमें 402 पायलट व्हेल, 4 बॉटलनोज डॉल्फिन, 168 वाइट-साइडेड डॉल्फिन और 132 अन्य वाइट-साइडेड डॉल्फिन शामिल थीं।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, इस घटना के दौरान बड़ी संख्या में लोग, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, मौजूद थे। समुद्री जीवों पर हमले के बाद इलाके में भारी मात्रा में खून फैल गया, जिससे समुद्र का पानी लाल दिखाई देने लगा और किनारों पर मृत जानवरों के ढेर लग गए।
यह आयोजन 27 मई को हुआ बताया जा रहा है। घटना के बाद ग्लोबल मरीन कंजर्वेशन संगठन के निदेशक वैलेंटीना क्रास्ट ने इस प्रथा पर कड़ा विरोध जताते हुए यूरोपीय सरकारों से इसे प्रतिबंधित करने की मांग की है, हालांकि अब तक इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
वहीं, पशु अधिकार संगठन PETA की अध्यक्ष एलिसा एलेन ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि व्हेल और डॉल्फिन बेहद संवेदनशील जीव होते हैं और वे दर्द व भय को महसूस करते हैं। उनके अनुसार, इन जीवों को समूहों में इस तरह मारना अत्यंत क्रूर और अमानवीय है।
पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह परंपरा करीब 1000 साल पुरानी वाइकिंग युग की है, जिसे आज के समय में जारी रखना जरूरी नहीं है। हालांकि फारो द्वीप प्रशासन का तर्क है कि इस गतिविधि के दौरान पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखा जाता है और उत्तर अटलांटिक में व्हेल व डॉल्फिन की संख्या पर्याप्त है, इसलिए इससे पारिस्थितिकी को नुकसान नहीं होता।
दूसरी ओर, स्थानीय कानूनों में भी हाल के वर्षों में बदलाव हुए हैं, जिनमें पशु कल्याण संबंधी नियमों और डॉल्फिन सुरक्षा प्रावधानों में संशोधन शामिल हैं। इस घटना ने एक बार फिर इस परंपरा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज कर दी है कि क्या सदियों पुरानी यह परंपरा आज के समय में जारी रहनी चाहिए या नहीं।
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