
जबलपुर। संस्कारधानी को स्मार्ट बनाने का दावा करने वाले जबलपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के अधिकारियों का एक और बड़ा कारनामा सामने आया है। शहर की चरमराई यातायात व्यवस्था को सुधारने के नाम पर 8 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च करके 3 जगहों पर मल्टीलेवल पार्किंग खड़ी कर दी गईं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ये पार्किंग्स आज पूरी तरह भूतिया और सूनी पड़ी हैं।
सड़क और फुटपाथ से गाडिय़ां हटने का नाम नहीं ले रही हैं। मुख्य बाजारों से लेकर गली-कूचों तक बेतरतीब खड़े चौपहिया वाहनों का जमघट लगा रहता है, जिन्हें इस पार्किंग की लिफ्ट तक पहुंचाने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा है। कागजों में तो दावा किया जा रहा है कि यातायात सुधरा है, लेकिन असलियत में स्मार्ट सिटी के अधिकारियों और ठेका कंपनी के बीच चल रही तगड़ी सांठगांठ के खेल में जनता का पैसा पानी में बह रहा है।
भंवरताल से सिविक सेंटर तक नो पार्किंग, सड़कों पर गाडिय़ों का कब्जा
स्मार्ट सिटी ने पार्किंग का निर्माण कर सारा जिम्मा ठेका कंपनी के भरोसे छोड़ दिया है और खुद सिर्फ अनुबंध के तहत किराया वसूलने में मस्त है।
पार्किंग सूनी है, तो ठेका कंपनी कैसे दे रही है किराया?
इस पूरे प्रोजेक्ट में सबसे बड़ा और संदिग्ध सवाल यही उठ रहा है कि जब मानस भवन और सिविक सेंटर की मल्टीलेवल पार्किंग में चार पहिया वाहन खड़े ही नहीं हो रहे हैं, तो ठेका कंपनी हर महीने अनुबंध के अनुसार अपनी तय राशि स्मार्ट सिटी के खाते में कैसे और क्यों जमा कर रही है? पार्किंग्स का कोई रखरखाव नहीं किया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि जब कमाई जीरो है, तो कंपनी जेब से घाटा सहकर सरकार को पैसा क्यों देगी? साफ है कि इस खेल के पीछे कोई बड़ा घालमेल है और ठेका कंपनी के मार्फत स्मार्ट सिटी के जिम्मेदार अधिकारी उपकृत हो रहे हैं।
कलेक्शन का आंकड़ा छुपा रहे जिम्मेदार
चूंकि यह पूरी राशि जनता की जेब से वसूली जा रही है, इसलिए नियम के मुताबिक मल्टीलेवल पार्किंग या अन्य प्रोजेक्ट्स से होने वाली आय को सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन में) किया जाना चाहिए। लेकिन स्मार्ट सिटी के जिम्मेदार अधिकारी यह बताने से साफ कतरा रहे हैं कि पार्किंग से कितना शुल्क वसूला गया और बैंक खाते में कितनी राशि जमा हुई। जानकारी छुपाने का यह रवैया साफ दर्शाता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। जब 8 करोड़ रुपये फूंकने के बाद भी वीआईपी इलाकों और बाजारों का ट्रैफिक रत्ती भर नहीं सुधरा, तो इस फिजूलखर्ची का जिम्मेदार कौन है?
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