
जबलपुर। पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों और पर्यावरण संरक्षण को लेकर बढ़ती जागरूकता के बीच जबलपुर में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की मांग तेजी से बढ़ रही है। शहर के ऑटोमोबाइल बाजार में पिछले एक सप्ताह के दौरान ई-वाहनों की बिक्री लगभग दोगुनी हो गई है। आम लोग जहां पेट्रोल-डीजल के बढ़ते खर्च से राहत पाने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का रुख कर रहे हैं, वहीं सरकारी तंत्र और जनप्रतिनिधियों का भरोसा अब भी पारंपरिक ईंधन से चलने वाले वाहनों पर ही टिका हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार और तेजी से बढ़ेगा, लेकिन इसके लिए मजबूत चार्जिंग नेटवर्क की आवश्यकता होगी। वर्तमान में शहर में ईवी अपनाने की गति और उपलब्ध सुविधाओं के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
चार्जिंग स्टेशन की भारी कमी
ई-वाहनों की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद शहर में चार्जिंग सुविधाएं बेहद सीमित हैं। नगर निगम के पास वर्तमान में केवल चार सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन हैं। निजी क्षेत्र में भी चार्जिंग नेटवर्क का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप अधिकांश वाहन मालिक अपने घरों पर ही वाहन चार्ज करने को मजबूर हैं। लंबी दूरी की यात्रा के दौरान चार्जिंग स्टेशन की कमी उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रमुख चौराहों, मॉल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और सरकारी पार्किंग स्थलों पर फास्ट चार्जिंग स्टेशन विकसित किए जाएं तो ईवी बाजार में कई गुना वृद्धि हो सकती है।
100 किलोमीटर में खर्च का बड़ा अंतर
ई-वाहनों की लोकप्रियता के पीछे सबसे बड़ा कारण परिचालन लागत में भारी बचत है। पेट्रोल वाहन से 100 किलोमीटर चलने का खर्च लगभग 200 से 250 रुपए। इलेक्ट्रिक वाहन से 100 किलोमीटर चलने का खर्च मात्र 15 से 20 रुपए। यही वजह है कि नौकरीपेशा लोगों, महिलाओं और युवाओं में ई-स्कूटी का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है।
ग्राहकों का झुकाव बढ़ा
शहर के कई उपभोक्ताओं ने बढ़ते ईंधन खर्च से बचने के लिए अपने पुराने पेट्रोल वाहन बेचकर इलेक्ट्रिक वाहन खरीदना शुरू कर दिया है। वाहन मालिकों का कहना है कि जहां पहले हर महीने पेट्रोल पर ढाई से तीन हजार रुपए तक खर्च हो जाते थे, वहीं अब बिजली बिल में केवल 300 से 400 रुपए का अतिरिक्त भार पड़ता है। हालांकि लंबी दूरी की यात्रा के दौरान चार्जिंग स्टेशन न मिलने की समस्या अब भी बनी हुई है।
अफसरों और नेताओं की गाडिय़ां अब भी तेल पर निर्भर
दिलचस्प तथ्य यह है कि आम जनता तेजी से ईवी की ओर बढ़ रही है, लेकिन सरकारी विभागों और जनप्रतिनिधियों के काफिलों में अब भी पेट्रोल और डीजल वाहनों का ही दबदबा है। पर्यावरण संरक्षण और ईंधन बचत के दावे करने वाले विभाग स्वयं इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में पीछे नजर आ रहे हैं।
बदल रही जनता, सिस्टम अभी पीछे
जबलपुर में इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति की शुरुआत तो हो चुकी है, लेकिन चार्जिंग नेटवर्क और सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन की कमी इसकी रफ्तार को सीमित कर रही है। शहर के लोग अब महंगे पेट्रोल-डीजल से दूरी बनाना चाहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशासन और नीति-निर्माता भी इस बदलाव के साथ कदम मिला पाएंगे, या फिर ईवी की यह दौड़ केवल आम जनता तक ही सीमित रह जाएगी?
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