
नई दिल्ली । फैटी लिवर (Fatty Liver) की समस्या तेजी से बढ़ती हुई देखी जा रही है। शराब का सेवन न करने वाले लोगों में होने वाली नॉन अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (Nonalcoholic Fatty Liver Disease) का नाम हाल ही में बदलकर मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज यानी एमएएसएलडी (MASLD) कर दिया गया है। इसे दुनियाभर में लिवर की सबसे आम क्रोनिक बीमारी (Chronic Disease) बताया गया है और यह करीब 32 से 38 प्रतिशत वयस्क आबादी को प्रभावित करती है।
भारत में भी फैटी लिवर एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन रहा है। यहां लगभग 38 से 40 प्रतिशत वयस्क इस बीमारी से प्रभावित बताए जाते हैं। आमतौर पर फैटी लिवर का खतरा अधिक वजन या मोटापे से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि कई लोगों को लगता है कि यदि शरीर दुबला है, वजन सामान्य है और पेट बाहर नहीं निकला है, तो उन्हें फैटी लिवर नहीं हो सकता। हालांकि, ऐसा जरूरी नहीं है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक लिवर में चर्बी जमा होने का संबंध केवल मोटापे से नहीं होता। सामान्य वजन वाले लोगों में भी फैटी लिवर की समस्या हो सकती है। ऐसे मामलों को पहले लीन फैटी लिवर के नाम से जाना जाता रहा है। फैटी लिवर से प्रभावित लोगों में करीब 7 से 20 प्रतिशत ऐसे हो सकते हैं जिनका शरीर दुबला होता है। भारत में भी सामान्य बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई वाले लोगों में फैटी लिवर पाया गया है। इसलिए केवल शरीर की बनावट देखकर लिवर को स्वस्थ मान लेना सही नहीं है।
दुबले-पतले लोगों में भी कई ऐसे कारण हो सकते हैं, जो लिवर में चर्बी जमा होने का खतरा बढ़ाते हैं। इनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस, पेट के अंदर जमा आंतरिक चर्बी और डायबिटीज जैसी स्थितियां शामिल हैं। इसके अलावा ट्राइग्लिसराइड या कोलेस्ट्रॉल की समस्या भी जोखिम बढ़ा सकती है। आनुवंशिक कारण, शराब का सेवन, कुछ दवाएं और लिवर से जुड़ी अन्य बीमारियां भी फैटी लिवर की वजह बन सकती हैं।
सामान्य बीएमआई होने का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि शरीर में चर्बी सही जगह पर ही जमा है। कुछ लोग बाहर से दुबले दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनके पेट के आसपास या शरीर के भीतर अधिक चर्बी मौजूद हो सकती है। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड जैसे मेटाबोलिक जोखिम भी फैटी लिवर से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए दुबले-पतले लोगों को भी इन जोखिमों की समय-समय पर जांच कराते रहना जरूरी है।
फैटी लिवर की शुरुआत कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के हो सकती है। यदि जांच में लिवर एंजाइम बार-बार बढ़े हुए मिल रहे हों या डायबिटीज और दूसरी मेटाबोलिक समस्याएं मौजूद हों, तो फैटी लिवर के जोखिम के बारे में जांच करानी चाहिए। बीमारी की पुष्टि होने पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार लिवर की स्थिति और फाइब्रोसिस के जोखिम की जांच भी कराई जानी चाहिए।
फैटी लिवर से बचाव के लिए केवल वजन कम करना ही जरूरी नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन और चीनी तथा अत्यधिक प्रोसेस्ड चीजों से दूरी बनाए रखना महत्वपूर्ण है। साथ ही डायबिटीज, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना भी जरूरी है। समय पर खानपान और जीवनशैली में बदलाव के साथ जरूरत पड़ने पर दवाओं की मदद से फैटी लिवर के खतरे को कम किया जा सकता है।